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व्यापार 2020 : बुरा सपना था 'लॉकडाउन', अनलॉक ने जगाई उम्मीद, निवेशकों की भारी कमाई

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नृपेंद्र गुप्ता

गुरुवार, 31 दिसंबर 2020 (21:40 IST)
2020 को कोरोनावायरस और कोरोना के कहर को थामने के उपाय के लिए लगाए गए लॉकडाउन और कर्फ्यू की वजह से याद किया जाएगा। कोरोना लॉकडाउन की वजह से दुनिया भर की अर्थव्यवस्था को ठप कर दिया। कोरोना संकट ने न सिर्फ अर्थव्यवस्था पर प्रभाव डाला बल्कि बेरोजगारी बढ़ाने के साथ ही निवेशकों के नजरिए को भी पूरी तरह बदल डाला। 2020 में भारतीय शेयर बाजार ने अपने सर्वोच्च स्तर को छुआ। आईपीओ में निवेश करने वालों की बल्ले बल्ले हो गई और सोना-चांदी की चमक भी बढ़ी।
 
बेहतर मानसून और शादी समारोहों की खरीदारी ने परंपरागत बाजार को मजबूती दी और त्योहारी सीजन में शहरी क्षेत्रों में बढ़ी मांग ने ऑनलाइन शॉपिंग मार्केट में नई जान फूंक दी। ऑटो सेक्टर में तो अक्टूबर-नवंबर 2020 में बिक्री के रिकॉर्ड को भी तोड़ दिया। चिकित्सा जगत के लिए तो यह वर्ष बेहतरीन रहा। वर्क फ्रॉम होम ट्रेंड देश में सेट हो गय। हालांकि पयर्टन, शिक्षा जगत, बॉलीवुड आदि 2020 को कभी याद नहीं करना चाहेंगे। इन बातों से भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली और बाजार कोरोना के कहर से तेजी से उबरते दिखाई दिए। कोरोना काल में लोगों को 2008 में आई मंदी और उसके बाद की तेजी की याद जरूर दिला दी।
 
लॉकडाउन : कोरोनावायरस के बढ़ते कहर को थामने के लिए दुनिया के कई देशों ने लॉकडाउन का सहारा लिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी भारत में 24 मार्च से 31 मई तक लॉकडाउन लगा दिया। इस दौरान देश में आर्थिक गतिविधियां पूरी तरह ठप हो गई। लॉकडाउन की वजह से देशभर में उत्पादन ठप हो गया। लाखों लोग बेरोजगार हो गए। देश में रोजमर्रा की वस्तुओं के लिए भी लोग तरसते दिखाई दिए। इस मुश्किल घड़ी में उद्योगों को उन मशीनों को भी बंद करना पड़ा जो कभी बंद नहीं होती है। देश ने मजदूरों का सबसे बड़ा पलायन देखा तो स्थिति सामान्य होती देख उनका भरोसा जीतने के लिए उन्हें प्लेन से बुलवाया गया। कोरोना लॉकडाउन का दंश उद्योगपतियों से लेकर मजदूरों तक सभी ने झेला और चाहकर भी कोई जीवन पर्यंत इसे आसानी से भुला नहीं पाएगा।
 
भारतीय अर्थव्यवस्था : लॉकडाउन की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था को लाखों करोड़ रुपए के भारी नुकसान का सामना करना पड़ा। उद्योग धंधों की कमर टूट गई, सरकार को भी ज्यादा टैक्स नहीं मिल सका। एक तरफ लोगों के पास काम नहीं था तो दूसरी ओर बढ़ते खर्च ने लोगों की पेशानी पर बल ला दिया। हालांकि सरकार ने 20 लाख करोड़ का आर्थिक पैकेज जारी कर अर्थव्यवस्था को संभालने का भरसक प्रयास किया।

आर्थिक पैकेज तो अर्थव्यवस्था के लिए वरदान बना ही साथ ही अनलॉक की सही प्लानिंग की वजह से देश कई सेक्टरों में तेजी दिखाई दी। देश में वर्क फ्रॉम होम कल्चर स्थापित हुआ। इसने आईटी सेक्टर को नई दिशा दी। दूसरी ओर RBI ने भी लोन मोरेटोरियम के माध्यम से आम लोगों को लोन की किश्तों में राहत दी।
 
सार्वजनिक ऋण पर 30 दिसंबर को जारी आंकड़े के मुताबिक सरकार की कुल देनदारी सितंबर 2020 को खत्म हुई तिमाही में 5.6 प्रतिशत बढ़कर 107.04 लाख करोड़ रुपए हो गई। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के अंत में सरकार का बकाया कुल ऋण 101.3 लाख करोड़ रुपए था। तिमाही आधार पर कुल देनदारी में 5.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी कोविड-19 संकट के कारण राजस्व संग्रह और बढ़ते खर्च पर दबाव को दर्शाती है। कुल मिलाकर इस वर्ष अर्थव्यवस्‍था जितनी तेजी से गिरी दिसंबर आते-आते इसमें तेजी की उम्मीद फिर दिखाई देने लगी। हालांकि आने वाले कई वर्षों तक भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोरोना का असर दिखाई देगा।
 
इन सेक्टरों के संघर्ष भरे दिन : हेल्थकेअर सेक्टर, ई कॉमर्स सेक्टर, आईटी सेक्टर जैसे कुछ सेक्टरों को छोड़कर लगभग सभी सेक्टरों पर इसका बुरा असर पड़ा। टूरिज्म, हॉस्पिटलिटी, रिअल एस्टेट, एजुकेशन, एविएशन, ट्रांसपोर्टेशन समेत कई सेक्टर बर्बादी की कगार पर पहुंच गए। कृषि सेक्टर को पहले कोरोना और फिर किसान आंदोलन से बड़ा झटका लगा। ऑटो सेक्टर, मेन्यूफेक्चरिंग सेक्टर जैसे कुछ सेक्टर्स लॉकडाउन में संघर्ष करते दिखाई दिए तो अनलॉक होते ही इनमें तेजी से स्थिति बदलती दिखाई दी। बैंकिंग सेक्टर पर राहत पैकेज का सहारा रहा। इस पर लॉकडाउन का वास्तविक असर 2021 में पता चलेगा।
 
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बैलआउट पैकेज : सरकार ने 13 मई 2020 को 20 लाख करोड़ रुपए के भारी-भरकम प्रोत्साहन पैकेज की घोषणा की। इस राहत पैकेज को इस तरह सभी वर्गों में बांटा गया ताकि अर्थव्यवस्था की जल्द से जल्द पटरी पर आ सके। यह देश की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 10 प्रतिशत था। आर्थिक पैकेज श्रमिकों, किसानों, ईमानदार करदाताओं, सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों और कुटीर उद्योगों सभी के लिए था। पैकेज में भूमि, श्रम, नकदी और कानून सभी क्षेत्रों पर ध्यान दिया गया। पैकेज में आत्मनिर्भर भारत से लेकर लोकल फॉर वोकल तक सभी बातों को समाहित किया गया। इससे पहले भी केंद्र सरकार ने गरीबों, बुजुर्गों और किसानों के लिए 1.74 लाख करोड़ रुपए के राहत पैकेज की घोषणा की थी। 
 
शेयर बाजार : वर्ष 2020 को लोग जहां कोरोना वायरस और लॉकडाउन की वजह से याद रखेंगे और तो शेयर बाजार भी इसे शायद ही कभी भूल पाएगा। निवेशकों के जेहन में यह साल बाजार में हुई उठापटक की वजह से हमेशा जेहन में रहेगा। सेंसेक्स में इस वर्ष 20,000 से ज्यादा अंकों की उठापटक हुई तो निफ्टी में भी 6000 अंकों से ज्यादा का उतार चढ़ाव देखा ‍गया। मार्च 2020 में सेंसेक्स ने अपना लो 25639 पर देखा इस माह निफ्टी भी गिरकर 7511 पर पहुंच गया।

कोरोना वायरस महामारी के शुरुआती दिनों में भारतीय बाजारों में 30 प्रतिशत की गिरावट आई थी। इसके बाद शेयर बाजार में जोरदार सुधार दर्ज हुआ। इस साल अप्रैल से शेयर बाजार में करीब 70 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी देखी गई। दिसंबर अंत तक सेंसेक्स और निफ्टी दोनों ही सर्वकालिक ऊंचाई पर थे। 31 दिसंबर को सेंसेक्स 48,000 की ओर बढ़ता दिखाई दिया तो निफ्टी ने भी 14 हजार के आंकड़े को छुआ। 

शेयर बाजारों के पास उपलब्ध आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि 2020 में नवंबर तक 12 आईपीओ के जरिए करीब 25,000 करोड़ रुपए जुटाए गए हैं। 2019 के पूरे साल में 16 आईपीओ के जरिए 12,362 करोड़ रुपए जुटाए गए थे।
 
पेट्रोल-डीजल : कोरोना की वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रूड की मांग कम रहने से उसके दामों में भारी कमी देखी गई। यह 16 प्रतिशत सस्ता हो गया। 31 दिसंबर 2019 को क्रूड 67 डॉलर प्रति बैरल था वहीं, 29 दिसंबर 2020 को यह क्रूड 51.38 डॉलर प्रति बैरल के आस पास ट्रेड कर रह हैं। हालांकि देशवासियों को इसका लाभ नहीं मिल सका।

रोज पेट्रोल डीजल के दाम तय करने वाली कंपनियों इस पर से आंखें मूंद ली। इतना ही नहीं यहां तो पेट्रोल-डीजल के दाम कम होने की बजाए उल्टा बढ़ गए। पेट्रोल करीब 8 रुपए और डीजल और लगभग 6 रुपए महंगा हुआ। 31 दिसंबर 2019 को दिल्ली में पेट्रोल और डीजल के दाम क्रमश: 75.14 रुपए प्रति लीटर और 67.96 रुपए प्रति लीटर थे। वहीं सालभर बाद आज दिल्ली में पेट्रोल 83.71 रुपए प्रति लीटर और डीजल 73.87 रुपए प्रति लीटर के भाव से बिक रहा है।
 
एफपीआई : विदेश पोर्टफोलियों निवेशकों (FPI) ने इस साल भारतीय शेयर बाजारों में 1.4 लाख करोड़ रुपए का रिकॉर्ड निवेश किया है। यह उनके निवेश का सर्वकालिक स्तर है। हालांकि एफपीआई ने ऋण या बांड बाजार से 2020 में 1.07 लाख करोड़ रुपए की निकासी की है। यह इतिहास में पांचवां अवसर है जबकि शेयरों में एफपीआई का शुद्ध निवेश किसी साल में एक लाख करोड़ रुपए को पार कर गया है। इससे पहले 2019 में एफपीआई ने शेयरों में शुद्ध रूप से 1.01 लाख करोड़ रुपए का निवेश किया था। NSDL के आंकड़ों के अनुसार, FPI ने 2020 में भारतीय पूंजी बाजार में 2,41,119 करोड़ रुपए लगाए जबकि 1,41,614 करोड़ रुपए की निकासी की। इस वर्ष 8 महीनों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजारों में पैसा लगाया और केवल माह ही अपनी रकम निकाली। 
 
म्यूचुअल फंड : यह वर्ष म्यूचुअल फंड निवेशकों के लिए शानदार रिटर्न देने वाला साबित हुआ। स्माल कैप में पैसा लगाने वालें निवेशकों को जमकर रिटर्न मिला। मिडकैप फंड में पैसा लगाने वालों को भी काफी फायदा हुआ। हालांकि कोरोना काल में धन की कमी को देखते हुए 2020 में इक्विटी म्यूचुअल फंड में से बड़ी संख्या में लोगों ने अपना पैसा निकाला। सेबी के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2020 में म्यूचुअल फंड से शुद्ध रूप से निकासी जनवरी से नवंबर के दौरान 28,000 करोड़ रुपए पर पहुंच गई। इस दौरान जिन निवेशकों ने संयम का परिचय दिया उन्हें भारी मुनाफा भी हुआ। म्यूचुअल फंड निवेशकों को 2021 में भी इसी तरह फायदे की उम्मीद है।
 
सोने में बढ़ी लोगों की दिलचस्पी : 2020 की शुरुआत में सोने की कीमत घरेलू बाजार में 39,100 रुपए प्रति दस ग्राम और अंतरराष्ट्रीय बाजार में 1517 डॉलर प्रति औंस थी। हालांकि कोरोनावायरस की वजह से लोगों ने सोने को सबसे सुरक्षित निवेश माना। देखते ही देखते इसकी कीमतों में तेजी से इजाफा हुआ और अगस्त में यह 56,191 रुपए प्रति 10 ग्राम तक पहुंच गया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत 2075 डॉलर या 1.52 लाख रुपए प्रति औंस रिकॉर्ड दर्ज की गई थी। फिलहाल यह 50,000 के करीब है। दूसरी ओर चांदी जनवरी में 47,000 हजार के करीब थी मार्च में गिरकर 39500 पर आ गई इसके बाद तेज रफ्तार पकड़ते हुए 68 हजार के पास पहुंच गई। 
 
रोजगार का हाल : कोरोनावायरस की वजह से रोजगार के मामले में लोगों का हाल बेहाल रहा। 2020 में फ्रेशर्स को रोजगार नहीं मिला वहीं लाखों अनुभवी लोगों की नौकरियां भी चली गई। मोदी सरकार ने इस वर्ष लगभग 15 नई योजनाओं के माध्यम कोरोना लॉकडाउन में बर्बादी की कगार पर पहुंचे लोगों को खड़े होने में मदद की। देश में जैसे-जैसे आर्थिक गतिविधियों ने रफ्तार पकड़नी शुरू की वैसे-वैसे नौकरी गंवाने वाले लोगों को फिर से रोजगार मिलने लगा।

EPFO के अनुसार, अप्रैल से अक्टूबर के बीच देश में 39.33 लाख नए सब्सक्राइबर जुड़े। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, कोरोना वायरस के चलते इस वर्ष बेरोजगारी दर रिकॉर्ड 23.52 फीसदी पर पहुंच गई थी जो नवंबर में बेरोजगारी दर 6.51 प्रतिशत पर आ गई। इससे सरकार को बड़ी राहत मिली।
 

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