Select Your Language

Notifications

webdunia
webdunia
webdunia
Thursday, 3 April 2025
webdunia

दोस्ती जैसे ताजी हवा का झोंका

ज्योत्स्ना भोंडवे

Advertiesment
हमें फॉलो करें फ्रेंडशिप डे
कभी हुकूमत के सख्त करारे सुरों में, तो कभी अपनेपन से नम भीगे खुशामदी सुरीले खून के रिश्ते भी अपनी कीमत मांग ही लेते हैं। फर्ज की खातिर ही सही हम भी तो इन्हीं रिश्ते-नातों के इर्दगिर्द ही घूमते देते-लेते हैं, लेकिन दोस्ती में ऐसी कोई जिम्मेदारी या शर्त नहीं होती।

FILE


दोस्ती, हवा के हल्के खुशगवार झोंके के मानिंद दिल को सुकून देती है, जिसे व्यक्त नहीं किया जा सकता। और ना 'बस जाओ कहा' तो वह जाएगी कभी। दिल के किसी कोने में रहेगी, केवड़े के इत्र की तरह। दोस्ती होती हैं। इट हॅपन्स। दोस्ती एक लौ है। स्टोव को पंप मारते हैं वैसे इस्तेमाल का पंप नहीं। गजल साम्राज्ञी बेगम अख्तर की आवाज में 'पत्ती' की खासियत रही। जिसके चलते श्रोता पत्ती कब लगेगी लगने का बेसब्री से इतंजार करते थे और लगी की घायल हो जाते। लेकिन खुद बेगम साहिबा के मुताबिक 'पत्ती' तय कर के नहीं आती सो दोस्ती भी तय नहीं होती। मंसूबा तय कर किया तो षडयंत्र, सो दोस्ती में प्लानिंग कैसी? रसेल ने क्या खूब कहा 'द मोस्ट फेटल थिंक टू लव इज काशन'

दोस्ती का कलेजा सूपड़े जितना, जिसमें सब कुछ समा जाए। दोस्ती को भेदभाव कतई मंजूर नहीं। जहां उम्र,जात,भाषा और औरत-मर्द की कोई शर्त नहीं। दोस्ती जो कई रूपों में जाहिर होती हैं। जिसके कुछ रूप तो बेहद यादगार हैं मसलन 'कृष्ण-मीरा','कृष्ण- सुदामा','राम-हनुमान' और 'हमन का यार है दिल में, हमन को बेकरारी क्या' कहने वाले कबीर भी तो राम के यार ही थे न? अकबर-बीरबल भी थे तो दोस्त, ओहदे की आब रखते की गई दोस्ती।

टैगोर का 'काबुलीवाला','मिस्टर एंड मिसेस 55' के गुरुदत्त और जॉनी वॉकर ये भी दोस्त ही लगते हैं।

'गांधी-पटेल', 'विनोबा-जयप्रकाश', 'मदनमोहन-बेगम अख्तर' भी तो दोस्ती के लुभावने रूप थे। लेकिन बावजूद इस सबके दोस्ती की बहुत बड़ी नैतिक जिम्मेदारी होती है। दोस्ती यानी 'निभाना' जो दोस्ती का सबसे मुश्किल इम्तहान है। ऊर्दू अदब में 'निबाहना' एक बेहद खूबसूरत 'कॉन्सेप्ट' है। निभाना यानी निबाह ले जाना।

दोस्ती का सबसे बेरहम इम्तहान यानी अपने ही जिगरी दोस्त पर लिखना। और यदि लिखने वाला बड़ा लेखक-कलाकार यह कॉम्बिनेशन हो तो और भी खतरा। दोनों की ही कसौटी। और ऐसा ही कभी पढ़ने में आया था जो लेखक कृश्नचंदर ने अपनी दोस्त इस्मत चुगताई पर लिखा, दिल को काफी छूने वाला था, पेश है-

इस्मत यानी बेहद जिंदादिल और बोल बर्ताव में तनावर। कृश्नचंदर के मुताबिक चार लोगों के बातचीत की महफिल में इस्मत इस शालीन और खालिस अंदाज में बैठतीं कि हर किसी को लगता की यह औरत यदि बोलने लगे तो मुंह से फूल झरने लगेंगे। लेकिन जब फूल झरना शुरू होते तो झरते ही चले जाते,यहां तक की सुनने वाले के चेहरे पर पतझड़ का मौसम छा जाता..."

हुज्जत और बहस का तो इस्मत को भारी शौक। मुखालिफ पर तो ऐसे टूट पड़ती की अच्छे-अच्छों की मिट्टी पलीत हो जाती। लेकिन यह सब करते इस्मत के दिल में जहर वगैरा कतई नहीं था अंदर तक सब निरा,निपट साफ और निर्मल। किसी मुद्दे की यदि आपने हिमायत की तो इस्मत खिलाफत का सुर पकड़ लेती। और यदि आप खिलाफ में बोले रे बोले की वह जोर देकर तरफदारी पर उतर आती। और अगर उसके जी में आया तो हक में और खिलाफ दोनों ही तरफ से बोलेगी। यानी कुलजमा आपके दिमाग में ऐसी झुनझुनी पैदा कर देती की आप खुद को पागल करार दें। बिलकुल बिल्ली है बिल्ली!

और ऐसी इस्मत के शाहिद से निकाह की खबर से तो सभी चकरा गए। कैसे निभाव होगा दोनों का? यह ख्यातनाम लेखिका, तो वह नामवर फिल्म निर्देशक। यह अफलातून तो वह घनचक्कर। यह मुगल तो वह पठान। दोनों के बीच ऐसी जबर्दस्त तकरार चलती की पूछो मत।

एक दफा दोनों में किसी बात को लेकर जबर्दस्त तकरार हो गई और वहां मौजूद घबराए सरदार जाफरी के मुताबिक तो तलाक तय था। उन्होंने शाहिद के नेशनल स्पोर्ट्स क्लब में अलग कमरा बुक कराने की खबर की तसल्ली भी फोन पर मैनेजर से कर ली। कृश्नचंदर चौंक गए। दूसरे दिन इस्मत के चर्चगेट वाले मकान दबे पैर दाखिल हुए। तो क्या देखते हैं दोनों मिया-बीबी सफेद कपड़ों में सजे,दो खूबसूरत कबूतरों के मानिंद एक ही सोफे पर साथ-साथ सटे बैठे थे। बेवकूफ तो हम ही थे।

इस्मत और शाहिद कितना ही झगड़ लें लेकिन दोनों में बेपनाह मोहब्बत रही। दोनों एक-दूजे की मर्यादा रखते। उनके बीच भरोसे का जो रिश्ता है कभी नहीं टूटेगा इस बात पर कृश्नचंदर जोर देकर कहते हैं। लेकिन हुआ कुछ और आखिर को शाहिद घर छोड़ कर जो गए तो फिर कभी नहीं लौटे। घर के दरवाजे पर सिर्फ नाम की वह तख्ती बस रह गई। लेख के आखिर में कृश्नजी ने एक दिल को छू लेने वाली याद कही-मेरे दिल्ली के घर इस्मत का कुछ दिन मुकाम था। एक रात खाना,गपशप और 'गुडनाइट' के बाद इस्मत ने कहा गर्मी है, सो आंगन में ही सोऊंगी, इंतजाम हो गया। अचानक रात को मेरी नींद किसी के रोने की आवाज से खुली। इस्मत के रोने की आवाज पहचानी। लेकिन मेरी आगे जाने की हिम्मत न हुई। वह रोना बड़ी देर तक जारी रहा और मैं सुनता रहा।

बाद में बहुत जी चाहा कि पूछूं 'इस्मत उस रात तुम क्यों रो रही थीं? वे आंसू किसके लिए थे? एक औरत के? या एक मां के? या एक धरती के लिए थे? बहुत जी चाहता है कि पूंछ ही लूं। मगर धरती की बेटी से पूछने की हिम्मत नहीं पड़ती। अगर कहीं उसने सच बोल दिया तो इतना बड़ा सच सह लेने की ताकत इस दुनिया में किसके पास हैं। यह सच लिखने के लिए भी कितनी हिम्मत लगती है। खैर, दोस्ती की बेमिसाल गाथाओं में यूं ही कड़‍ियां जुड़ती रहे। शुभकामनाएं।

हमारे साथ WhatsApp पर जुड़ने के लिए यहां क्लिक करें
Share this Story:

वेबदुनिया पर पढ़ें

समाचार बॉलीवुड ज्योतिष लाइफ स्‍टाइल धर्म-संसार महाभारत के किस्से रामायण की कहानियां रोचक और रोमांचक

Follow Webdunia Hindi