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समीर इन्दौरी
पोपट बोले नर्स से - 'जीवन है बेरंग।
बाहर छाई होली, लेकिन मन में नहीं तरंग॥
हाय नर्स! कुछ तो करो, टूटी सारी आस।
या तो कर दो ठीक मुझे, या दे दो सल्.फास॥'
नर्स ने सोच विचार के, सुई लगाई एक।
अगले क्षण पोपट उठे, तकिया-चद्दर फेंक॥
चीखे पोपट, कूदे पोपट, मुँह से निकली बोली।
'आज न छोड़ेंगे हमजोली! खेलेंगे हम होली॥'
लपके पीछे, भागी नर्स, लई कलाई थाम।
कसमसाई बाँहों में - 'मैं कहाँ फँसी, हे राम॥
इंक छिड़ककर दिया, बदन नर्स का लाल।
चीख-चीखकर हो गई, बेचारी बेहाल॥
तभी बड़े डॉक्टर ने घोंपी, पोपट को एक सुई।
गिरे पलंग पर पोपटजी, मुँह से निकला - 'उई'॥
डॉक्टर ने पूछा - 'हे नर्स' बात एक बतलाओ।
रोगी की इस मस्ती का, राज़ हमें समझाओ॥
नर्स ने जैसे-तैसे अपनी साँसें कर लीं काबू।
हाँफ-हाँफकर बोली - 'आय'म सॉरी डॉक्टर बाबू॥
देखा नहीं गया मुझसे, पोपट का वो टेंशन।
इसीलिए दे डाला भंग का, एक स्ट्रौंग इंजेक्शन॥