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कली और भ्रमर

प्रेम व्यंग्य

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प्रेम
- महेन्द्र साँघी

ND
कलियों ने पूछा कहो भ्रमर
भटकते क्यूँ हो कली-कली,
आवारा बनकर
यूँ दर-दर।

एक जगह क्यों नहीं टिकते
जाकर के तुम्हारे कदम,
एक जगह क्यों नहीं बैठकर
चैन के साथ तुम लेते दम।

सुनो यदि किसी एक जगह
जाकर के तुम बस जाओगे,
आवारापन छूट जाएगा
शरीफ कीड़े कहलाओगे।

भ्रमर ने कहा कि हे कलियों
तुम श्रृंगार करती हो,
अनुपम रंगों को समेटकर
बनती हो सँवरती हो।

कोमलता का मधुर अहसास
तुम साथ लेकर जनमती हो,
मनभावन खुशबुओं से
तुम हरदम ही महकती हो।

स्वयं ही आकर्षणकी लौ लगाकर
हमे अपने पास बुलाती हो,
फिर इस तरह से दिल तोड़कर
खरी-खोटियाँ सुनाती हो।

फिर भी यदि मैं जाकर
घर बना के बस जाऊँगा,
तुम्हारे कहे के अनुसार
शरीफ कीड़ा बन जाऊँगा।

तो सोचो तुम्हारा श्रृंगार
फिर फीका पड़ जाएगा,
तुम्हारे सौंदर्य की प्रशंसा में
जब सुहाने गीत कोई ना गाएगा।

मैंने सदा तुम्हें अपना
प्यार भरा दिल दिखाया है,
किसी इंसानी शरीफजादेकी तरह
तुम्हें कभी न शिकार बनाया है।

क्या किसी भ्रमर ने कुचला तुमको
या किया पंखुड़ियों का चीरहरण,
फिर क्यों मेरा यूँ घूमना
लग गया तुम्हें आवारापन।

तुम्हारे प्रति मेरा प्रेम
सदा रहा है निर्मल निष्पाप,
बस सौंदर्य उपासना गीतों का
मैंने सदा लिया है आलाप।

युगों-युगों से कर रहा हूँ
तुम्हारी बगिया में मैं प्रवास,
कोई दुराव नहीं इस प्रेम में
गवाही देंगे चाँद और आकाश।

जितनी उम्र है वनस्पति जगत की
उतना पुराना हमारा रिश्ता है,
प्राणीजगत है बेजुबान पर
मानव जगत से बहुत अधिक सच्चा है।

नई हवा के रुख में क्या?
खल रही है मेरी बदसूरती,
किसी साहबजादे की क्या
बस रही मन में मूरती।

सदा गुणों को पूजने वाली
रूप को पूजने लगी हो तुम?
नये जमाने की चकाचौंध में
क्या तुम भी हो गई हो गुम?

क्या इसीलिए चाहती हो गढ़ना
शराफत की नई परिभाषा,
क्या इसी बहाने चाहती हो
दिखाना मुझे, बाहर का दरवाजा।

तुम मर्जी की मालिक हो मगर
कर देता हूँ तुम्हें आगाह,
रूप से धोका खाओगी तुम
फिर याद आएगी मेरी चाह।

ये आजकल के साहबजादे
कलियों पर अवश्य मरते हैं,
किंतु समझ लेना कलियों को ये
एक रात्रि की संपत्ति समझते हैं।

यदि तुम मुझसे हो गई विमुख
तो मैं तो लुट जाऊँगा,
तुम सा साथी कहाँ मिलेगा
जीवन मधुरस कहाँ से पाऊँगा।

वैसे खूब समझता हूँ मैं
तुम मुझसे ठिठोली करती हो,
पर अपने निश्छल अंतर्मन से
तुम मुझ पर ही मरती हो।

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