दिवाली आ गई है। लच्छूराम बेहद टेंशन में आ गए हैं कि अब बत्तीसी निपोरकर खुश होना पड़ेगा। दिवाली चूँकि थोकबंद खुशियों का पारंपरिक त्योहार है, इन्हें अपनी हर वक्त तनी-तनी रहने वालीं चेहरे की मांस-पेशियों को ढीला छोड़कर जबरन पाँच सौ वाट के बल्ब सा जगमगाना पड़ेगा। उनकी निजी प्रगतिशीलता की विरोधी यह असंगत बात उन्हें बिलकुल पसंद नहीं। 'काहे को खुश हों! क्यों निपोरें अपनी पीली दंतपंक्ति ! क्या बारात निकल रही है हमारी!'
परंपरा है, पुरखों के कंधे पर सवार होकर सदियों से चली आ रही है। लाख दुःखों के बावजूद दिवाली खुशियों का त्योहार रहता चला आया है, बाप-दादे भी यही मानते चले आए हैं। चाहे जो हो, परंपरा तो निभाना ही है। हो लो थोड़ा सा खुश, तुम्हारे बाबा का क्या जाता है! घरवाली लच्छूराम को समझाती है, मगर लच्छूराम की भी अपनी परंपराएँ हैं, हमेशा धनुष की प्रत्यंचा-सा तना रहना।
उनका तर्क है- 'राम का वनवास खत्म हुआ, राम ने लंका फतह की, राम को सीता मिली, राम अयोध्या लौटे, राम को गद्दी मिली, तो हम क्यों खुश होवें ? क्यों घर की पुताई करवाएँ ? पागल कुत्ते ने काटा है क्या ?'
'चलो पुताई मत करवाओ, खुश भी मत हो, दिवाली है, थोड़ा मुँह मीठा करने की व्यवस्था ही कर लो!'
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'क्यों कर लें! शादी हो रही है क्या हमारी ? दिवाली है तो गाँठ की जमा पूँजी बनियों को दे आएँ ! बेसन-मैदे के फालतू आइटम खाएँ, पेट खराब करवाएँ। नकली मावा बनाने वालों को बढ़ावा दें, मरें। वैसे ही आजकल मोटापा, बीपी, शुगर, हायपरटेंशन, गठिया, बवासीर सौ बीमारियाँ जी का जंजाल बनी हुई हैं, ये फालतू नमकीन-मिठाइयाँ खा-खिलाकर बिलावजह मुसीबत मोल ले लें। यह भी कोई बात हुई, पाँच हजार साल पहले कोई बात हो गई, तो हम आज डालडा-घी का लड्डू खाएँ और बीमार पड़ें। यह कहाँ की समझदारी है।'
'चलो, न मीठे बनो, ना मीठा खिलाओ, दो-एक जोड़ी पेंट-शर्ट ही न हो तो रेडीमेड खरीद लाओ बाज़ार से। नहा-धोकर पहन लोगे तो अच्छे लगोगे।'
'क्यों पहनें ? क्या घोड़ी पर चढ़ना है हमें ! क्यों जाएँ हम अपना गला कटवाने, क्या पुराना पजामा पहनकर दिवाली नहीं मनती?'
'चलो कुछ मत पहनो, नंगे बैठे रहो। बच्चों के लिए सौ-पचास रुपए के पटाखे ही खरीद लाओ!' 'पटाखे? क्या हमारी बारात में आतिशबाजी होने वाली है !'
'आग लगे तुमाई ऐसी पढ़ाई-लिखाई को जो दो मिनट खुश भी होने न दे। अरे, बच्चों की खुशी के लिए थोड़ा खुश होकर, मीठा खाकर, दो पटाखा चलाकर दिवाली मनाने से क्या तुमाई ये थोथी प्रगतिशीलता पाताल में चली जाएगी?