दोस्त आगे बढ़ गए
गीतकार नीरज के मशहूर गीत की पैरोडी
-
देवेंद्र मूल गीत - कारवाँ गुजर गया फिल्म- नई उमर की नई फसल
दोस्त आगे बढ़ गए, कई सीढ़ी चढ़ गए!
नए-नए कई तोते, 'रामराम' पढ़ गए!!
और हम खड़े-खड़े, शर्म से गड़े-गड़े
अपनी ठंडी काया का बुखार देखते रहे!
टूट चुके सपनों की मजार देखते रहे!!
नींद भी खुली न थी, 'अपॉर्चुनिटी' फिसल गई
'एप्लाई' करने-करने में 'एज' ही निकल गई।'
पिताजी ने चाहा था- डॉक्टर, इंजीनियर बनूँ।
अपनी जड़ें नोंच फेंकूँ सबसे सुपीरियर बनूँ॥
सबसे 'सुपीरियर बनूँ॥
हर जगह पे लंबी क्यू, नौकरी की ख्वाहिशें!
वी.आय.पी. कैंडीडेट्स की वी.आय.पी. सिफारिशें।
और हम लुटे-लुटे, 'ट्रेंड' से पिटे-पिटे
बेसिफारिश लोगों की कतार देखते रहे।
टूट चुके सपनों की मजार देखते रहे॥
इच्छा थी, कुटुम्ब का कर्ज़ मैं उतार दूँ,
माँ के मर्ज को भी मैं एक दिन सुधार दूँ।
पीढ़ियों से खंडहर बने घर को भी सँवार दूँ,
रूठी बीवी को भी मोटे बटुए की बयार दूँ!
बटुए की बयार दूँ!!
लानतें! शर्मिंदगी! फँस गई है ज़िंदगी!
रिस गए घड़े, न मिटी प्यास, तृष्णा, तिश्नगी!
और हम कटे-कटे, दीवार से सटे-सटे,
ऊँट के मुँह में जीरे-सी पगार देखते रहे।
टूट चुके सपनों की मजार देखते रहे।