* पुतला जलाना परंपरा है। मनोरंजक, बेतुकी, ऊर्जाखाऊ और खूब कवरेज पाने वाली परंपरा। * जलाऊ पुतले सब एक जैसे होते हैं। बदसूरत, बेडौल, भूसभरे। * पुतले जिसके होते हैं, उसके जैसे तो कहीं से भी नहीं लगते। हो सकता है, उसकी अंतरात्मा से मेल खाते हों। * जो भी हो, उस इंसान का अपने पुतलों से गहरा लगाव होता है तथा वह खुद और उसके 'वाले' आत्मदाह की हद तक जाकर भी पुतलादाह रोकते हैं। * पुतलादाह रोकने के लिए सरकार और प्रशासन की कमर कसी रहती है और छीनाझपटी में अकसर पुतले का वजन घट जाता है, क्योंकि उसका भूसा बिखर जाता है। * वैसे टीवी, किसी मुद्दे के विरोध में जिंदा जल जाने वालों को भी पुलिस की निष्क्रिय उपस्थिति सहित, दिखाता तो है, पर यह मामला पुतला दहन की तरह सीरियसली नहीं लिया जाता।
* यहाँ दहेज पीड़िता स्त्री या व्यवस्था पीड़ित पुरुष की देह का जलना क्षम्य और सह्य है, मगर पुतला न जलने दइहौं... हाँ।
* पुतलों के बढ़ते महत्व के दौर में वह दिन दूर नहीं, जब हर बस्ती के हर आँगन में 'निजी रावण' का पुतला भस्मीभूत होगा।
* प्रतीक्षा है, शिक्षित बेरोजगारों द्वारा संचालित- 'जलाऊ पुतला विक्रय केन्द्रों' की। एक साथ दो पुतले खरीदने पर बेरोजगारी का पुतला फ्री।
* हमें ताना देती है एक प्रसिद्ध कव्वाली कि .. 'माटी के पुतले तुझे कितना गुमान है?' और हमें ज्ञान प्राप्त होता है कि सचमुच! मंत्रीजी के, भूसभरे और उतने ही मोटे पुतले के सामने इंसान के माटी के पुतले की औकात कुछ भी नहीं।