जो भी बाकी देशों के लोग कर सकते हैं, हिंदुस्तानी और बेहतर कर सकता है और यह बात सदियों से लागू है, केवल आज की बात नहीं है। जिस जमाने में समुराई (तलवारबाजी) बहुत मशहूर हुआ करती थी, तब भी भारतीयों का बोलबाला था। पेश है नमूना-
एक शक्तिशाली सम्राट ने घोषणा कराई कि उसे एक सर्वश्रेष्ठ समुराई (तलवारबाज) की आवश्यकता है। एक साल के समय में तीन समुराई ने नौकरी के लिए प्रार्थना पत्र दिया, एक जापानी, एक चीनी और एक भारतीय समुराई।
सम्राट ने उन्हें अपने जौहर दिखाने के लिए कहा- पहले जापानी समुराई ने एक माचिस की डिबिया खोली, उसमें से एक मक्खी निकलकर उड़ी, हूश! उसकी तलवार चली और मक्खी दो टुकड़ों में जमीन पर पड़ी थी।
बादशाह खुश हुए 'कमाल है।'
चीनी समुराई ने भी माचिस की डिब्बी निकालकर मक्खी उड़ाई और तलवार चलाई, हूश, हूश- मक्खी चार टुकड़ों में जमीन पर पड़ी थी।
सम्राट और भी आंदोलित हुए 'और भी बड़ा कमाल है।'
अब भारतीय समुराई की बारी थी। वही प्रक्रिया दोहराई गई। माचिस से मक्खी उड़ी और तलवार चली हूश! हूश! मक्खी फिर भी मँडराती रही।
बादशाह आश्चर्यचकित हुए 'क्या बात है, तुम्हारी तलवारबाजी में क्या खास है?'
जवाब आया 'आलमपनाह ध्यान से देखें, मक्खी के नाक-कान काट दिए गए हैं!'