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महेंद्र सांघी
वेबू : वो क्या है काका कि कई दिनों से आरटीओ ऑफिस के चक्कर लगा रहा हूँ मगर लायसेंस नहीं बन पा रहा।
काका : अरे अभी तक लायसेंस नहीं। मगर तुम तो पिछले दो वर्षों से सड़क पर धुआँधार गति से स्कूटर दौड़ा रहे हो।
वेबू : काका वाहन चलाना आना और आपके पास लायसेंस होना दोनों जुदा मसले हैं। लायसेंस होना मुझे इसलिए जरूरी लगा कि यह एक तरह का देशी पासपोर्ट है, जो हर जगह परिचय के काम आ जाता है।
काका : अरे तो फिर धक्के क्यों खा रहे हो। आरटीओ के बाहर गुमटी नंबर उनपचास पर श्यामलालजी से मेरा नाम लेकर मिल लो, वो तुम्हारा काम घर बैठे कर देंगे।
वेबू : काका क्या आपका नाम लेने से क्या वे बारह सौ रुपए भी नहीं मांगेंगे।
काका : खिसियानी हंसी बिखरते हुए! अरे भई सेवा शुल्क तो लगेगा ही। आखिर वह टू व्हीलर के साथ फोर व्हीलर लायसेंस भी तो घर बैठे बनवा देगा। यूं भी इतने रुपए तुम आरटीओ ऑफिस के चक्कर लगा-लगाकर पेट्रोल में फूँक दोगे।
वेबू : काका यह गलत है।
काका : मगर एक दलाल का घर तो चल रहा है और आरटीओ अधिकारियों का घर भर रहा है। वे खुश रहेंगे और उधार बाँटेंगे।
वेबू : काका पहले तो यह बताओ कि लायसेंस की आवश्यकता ही क्या है। सबसे बड़ा लायसेंस तो माता-पिता का होता है, जब वे अपने सुपुत्र या सुपुत्री को मु्ख्य सड़क पर वाहन ले जाने की अनुमति देते हैं, गली में सीख चुकने के बाद। इस लायसेंस में कोई भ्रष्टाचार नहीं है।
काका : यह तो तुमने सो टका खरी बात कही है?
बेवू : फिर यदि सरकार भ्रष्ट्राचार को रोक नहीं सकती और लोगों की जेब से हजार रुपए जाना ही हैं तो सरकार वे हजार रुपए खुद क्यों न ले। सरकार को चाहिए कि बीमा एजेन्टों की तरह ऐसे लोगों की खुली नियुक्ति करे, जो लायसेंस के लिए इच्छुक लोगों के पास स्वयं जाकर उनकी मदद करें, उनकी ट्रायल लें और लायसेंस दे दे।
काका : अर्थात आरटीओ जाकर लायसेंस बनवाने पर नाममात्र का शुल्क और एजेन्ट से घर बैठे लेने पर थोड़ा ज्यादा। वाह! इससे तो वे ढेरों लोग लायसेंसधारी हो जाएँगे, जो बिना देशी पासपोर्ट के सड़कों पर घूम रहे हैं।
वेबू : और सरकार को भी इतना ज्यादा शुल्क मिलेगा कि वह दंग रह जाएगी।
काका : वैसे वेबू भारत जैसे कल्याणकारी राज्य में तो यह होना चाहिए कि वाहन चालक बस एक शपथ पत्र दे दे कि वह वाहन चलाना जानता है और उसे नियत शुल्क लेकर लायसेंस मिल जाए। आखिर सबसे बड़ा लायसेंस इस बात में है कि आदमी को खुद की जान सबसे प्यारी है।
वेबू : हँसते हुए वाह काका! मैं फिर कहता हूं कि आपको तो दिल्ली में होना चाहिए था।
काका : ना बाबा ना, वहाँ शराफत व देशप्रेम का झूठा लायसेंस लिए देश भर के चतरे लोग बैठे हैं।