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देवेंद्र
संक्रांति जब आई तो, दिया पड़ोसी रोय।
गिल्ली-डंडा के खेल में, शीशा ना साबुत कोय।
गिल्ली-डंडा के जैसी, जोड़ी जुगल सुहाय।
बिन गिल्ली, डंडा चले, बिन डंडा, गिल्ली निरूपाय।।
आया पतंगों का मौसम, रंगीन है आकाश।
हम भी पतंगों के जैसे, उड़ पाते रे काश।।
हवाई जहाज तो शोर करे, उड़ती मौन-पतंग।
जितनी ऊँची वह उड़े, मन में उतनी उमंग।।
संक्रांति की शुभकामना, आप सबको हुजूर।
तिल्ली के लड्डू जैसे, महको, बनो मधुर।।