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देवेंद्र शर्मा
दीपावली का बीत गया चमकीला त्योहार।
सबने खूब निचोड़ लिए, शॉप, मॉल, बाजार।।
पर्यावरण की शुद्धि के, धुआँ हुए सब नारे।
पीते हैं बारूदी हवा को, फेफड़े ये बेचारे।।
मंचों पर जो चीखते थे- रहेंगे प्रदूषण हटा के।
फोड़े उन नेताजी ने, लाख रुपए के पटाखे।।
कुत्ते भागे, चिडि़या दुबकीं, रोए पप्पू, गुड्डी।
और बदमाश पटाखे खेले, सड़क पे खुली कबड्डी।।
ऊँचा सुनता देख अमित को, हमने पूछा-बोलो।
अपने बहरेपन का बच्चू, राज आज तुम खोलो।।
वह बोला- यह मत समझो, दोषी सिर्फ पटाखे।
लोग फोड़ते कान, रे भाई, डीजे म्यूजिक बजा के।।
हर मौके पर करता है मानव खूब प्रदूषण।
फकीर होती कुदरत, हम विकलांग हो रहे क्षण-क्षण।।
छेद रहे ओजोन परत को, फोड़ते सबके कान।
त्योहारों का मकसद क्यूँ, भूले हम नादान ?
शांति, प्रेम ही है आखिर, हर प्रसंग का अर्थ।
खर्च करें हम 'शोर-धमाकों' पर क्यूँ, कहिए व्यर्थ?
तभी विवाह भी शुभ होंगे, शुभ है तभी दिवाली।
जब हम इनको नहीं देंगे, प्रदूषणों की गाली।।