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गणपति पर्व से जुड़ा देश के स्वराज का गर्व

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ऋतुपर्ण दवे

गणपति हिन्दुओं के आदि आराध्य देव होने के साथ-साथ प्रथम पूज्यनीय भी हैं। किसी भी तरह के धार्मिक उत्सव, यज्ञ, पूजन, सत्कर्म या फिर वैवाहिक कार्यक्रमों में सभी के निर्विघ्न रूप से पूर्ण होने की कामना के लिए विघ्नहर्ता हैं और एक तरह से शुभता के प्रतीक भी। ऐसे आयोजनों की शुरुआत गणपति पूजन से से ही की जाती है। 
 
शिव पुराण के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश जी का जन्म हुआ था जिन्हें अपने माता-पिता की परिक्रमा लगाने के कारण माता पार्वती और पिता शिव ने विश्व् में सर्वप्रथम पूजे जाने का वरदान दिया था। तभी से ही भारत में गणेश जी की पूजा और आराधना का किसी न किसी रूप में प्रचलन है जो निरंतर जारी है।
 
गणेशोत्सव के सार्वजनिक पूजा में बदलने की सही तिथि का किसी को भी नहीं पता है लेकिन इतिहास में जो प्रमाण हैं उससे केवल अनुमान ही लगाया जाता है कि ‘गणेश चतुर्थी’ की शुरुआत सन् 1630 से 1680 के बीच मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी के शासनकाल में की गई थी। 
शिवाजी महाराज के बचपन में उनकी मां जीजाबाई यानी राजमाता जिजाऊ ने पुणे में ग्रामदेवता कस्बा में गणपति की स्थापना की थी। तभी से यह परंपरा चली आ रही है। तब हर वर्ष एक सार्वजनिक समारोह के रूप में साम्राज्य के कुलदेवता के रूप में पूजने की प्रथा थी। इसके बाद से निरंतर इस पर्व को किसी न किसी रूप में मनाए जाने के प्रमाण मिलते हैं। 
 
बताते हैं कि पेशवाओं के अंत के बाद यह पर्व एक पारिवारिक उत्सव तक सीमित रह गया था। इसे दोबारा सार्वजनिक रूप से मनाए जाने के कारणों से पहले थोड़ा इतिहास में भी झांकना होगा। दरअसल पेशवा जो कि एक फारसी शब्द है राजा के सलाहकार परिषद यानी अष्ट प्रधान में सबसे खास होते थे, इसीलिए राजा के बाद इन्हीं का स्थान आता था। यह शिवाजी के अष्ट प्रधान मंत्रिमंडल में प्रधान मंत्री अथवा वजीर का पर्यायवाची पद था। 
 
पेशवाई सत्ता के वास्तविक संस्थापन तथा पेशवा पद को वंश परंपरागत बनाने का श्रेय ऐतिहासिक क्रम से सातवें पेशवा, बालाजी विश्वनाथ को है जिनकी दूरदृष्टि ही थी कि मराठाओं का महासंघ बना। यह मराठा महासंघ 1800 ई. में पेशवा के मंत्री नाना फड़नवीस की मृत्यु के बाद उत्पन्न मतभेदों से जूझ रहा था और उधर अंग्रेजों की हैसियत बढ़ रही थी। 
 
मराठा प्रदेश के राजाओं के आपस में संघर्ष चल रहे थे उनमें पूना के निकट हदप्सर पर बाजीराव द्वितीय को यशवंतराव होल्कर ने पराजित किया। पेशवा बाजीराव भाग कर बसई पहुंचे और ब्रिटिश सत्ता से शरण मांगी। बदले में ब्रिटिशों ने बाजीराव से अपमानजनक शर्तों की संधि करवाई। जिसे बसई संधि कहते हैं जो 31 दिसंबर 1802 को हुई। इसके अनुसार पेशवा को अपने यहां ब्रिटिश सेना की एक टुकड़ी रखने और खर्चे के लिए 26 लाख रुपए की वार्षिक आय का अपना इलाका ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप देने पर सहमत होना पड़ा। संधि की एक शर्त यह भी थी कि अन्य राज्य से अपने संबंधों और व्यवहार के मामलों में पेशवा ईस्ट इंडिया कंपनी के आदेशानुसार काम करेंगे। 
 
इस प्रकार मराठा स्वतंत्रता इस संधि के परिणामस्वरूप ब्रिटिश सत्ता के हाथों कठपुतली बन गई। कहते हैं कि इसके बाद से गणेश पर्व पारिवारिक उत्सव बनकर सीमित रह गया था। लेकिन परतंत्रता के दौर में अंग्रेजों ने किस कदर के जुल्म ढ़ाए कहने की जरूरत नहीं क्योंकि उससे हर भारतीय वाकिफ है। तब राजनीतिक कार्यक्रमों की मनाही थी और लोगों की भीड़ को सीधा गिरफ्तार कर लिया जाता था। कानून का विरोध करना या ज्यूडिशियल रिफार्म पर बहस बहुत दूर की बात थी। बल्कि अपने हक के लिए विरोध प्रदर्शन तक देशद्रोह की श्रेणी में आता था। 
 
इसी समय लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ‘स्वराज’ के लिए न केवल संघर्ष कर रहे थे, बल्कि स्वराज की अलख घर-घर और जन-जन तक पहुंचाने का बीड़ा भी उठाए हुए थे। उनके मन में विचार आया कि क्यों न गणेश चतुर्थी को एक बड़े आयोजन की शक्ल देकर मनाएं जिससे ब्राह्मणों और गैर ब्राह्मणों के बीच के संघर्ष भी खत्म हो सके और सभी लोगों के बीच एकता कायम हो जाए और स्वराज का संदेश भी पहुंच जाए।
 
इसी सोच को लेकर 1893 में पहली बार सार्वजनिक गणेश उत्सव की शुरुआत बाल गंगाधर तिलक ने की और सार्वजनिक पर्व मनाने का आव्हान किया। हुआ भी वही जो तिलक चाहते थे उत्सव के पूरे दस दिनों में हर रोज बड़ी-बड़ी शख्सियत जैसे खुद लोकमान्य तिलक, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, वीर सावरकर, विपिनचंद्र पाल, लाला लाजपत राय, पं. मदन मोहन मालवीय, चापेकर बंधु, बैरिस्टर जयकर, रेंगलर रघुनाथ पुरुषोत्तम परांजपे, मौलिकचंद्र शर्मा, दादासाहेब खापर्डे, बैरिस्टर चक्रवर्ती और सरोजनी नायडू जैसे लोग भाषण देने पहुंचते और स्वतंत्रता का संदेश भी देते। लोग भी जबरदस्त प्रेरित होने लगे लेकिन अंग्रेज चाहकर भी कुछ कर भी नहीं पाते थे क्योंकि गणेश पर्व धार्मिक कार्यक्रम था जिसमें शामिल भीड़ को वो कानूनन गिरफ्तार नहीं कर सकते थे।
 
इस तरह गणेशोत्सव परिवारिक उत्सव की जगह समुदायिक भागीदारी के जरिए मनना शुरू हो गया। इसी बहाने हर कहीं और कभी भी लोग आपस में मिलने-जुलने लगे। समाज और समुदायों का मेलजोल भी बढ़ा तथा लोग हर बार नई भव्यता का स्वरूप देने के लिए बार-बार मिलते। इस तरह यह पर्व सामुदायिक त्योहार बन गया जिसमें बौद्धिक विचार, वाद-विवाद, भाषण, कविता, नृत्य, भक्ति गीत, नाटक, संगीत समारोह, लोक नृत्य के साथ अंग्रेजों को खदेड़ने पर भी सोच विचार करते। देखते ही देखते यह पर्व एक आंदोलन बन गया जिससे लोगों में एकजुटता के साथ भाईचारा भी खूब बढ़ा जो अंततः स्वराज हासिल करने के लिए ब्रम्हास्त्र बना।
 
साल दर साल आयोजन में बढ़ती भीड़ के साथ अंग्रेजों की मुश्किलें भी बढ़ने लगीं। अंग्रेजों की परेशानी का जिक्र रोलेट एक्ट में भी मिलता है जिसमें कहा गया था कि गणेशोत्सव के दौरान युवाओं की टोलियां सड़कों पर घूम-घूम कर ब्रिटिश हुकूमत विरोधी गीत गाती है जिसमें स्कूली बच्चे पर्चे बांटते हैं तथा हथियार उठाने और मराठों से शिवाजी की तरह विद्रोह करने का आह्वान करते हुए अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए इस धार्मिक संघर्ष को जरूरी बताते है। इस तरह स्वतंत्रता संग्राम के अगुवा भी विघ्नहर्ता गणेश बन गए।
 
गणेश पूजन की शुरुआत भाद्रपद शुद्ध चतुर्थी से शुरू होती है और अनंत चतुर्दशी पर समाप्त होती है। 11वें दिन गणेश विसर्जन नृत्य और गायन के साथ सड़क पर एक जुलूस के माध्यम से किया जाता है जिसमें लोग भगवान से अगले साल फिर आने की प्रार्थना करते हैं। इस तरह महाराष्ट्र से शुरू हुआ आंदोलन रूपी पर्व पूरे देश की अटूट श्रध्दा की पहचान बन गया तथा विदेशों में भी तमाम जगह शिद्दत से मनाया जाता है। समय के साथ पर्व का स्वरूप जरूर बदलता रहा लेकिन विविधता भरे भारत की एकजुटता के लिए गणपति अब भी शाश्वत हैं और यही सत्य है।

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