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Ganga Dussehra 2026: स्वर्ग से कैसे धरती पर आईं पतित पावनी मां गंगा? भगीरथ के इस कठोर तप की कहानी झकझोर देगी!

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The picture shows the amazing story of the arrival of the Mokshadayini Mother Ganga on earth and the photo of the worship  scene
Ganga Dussehra Story 2026: मां गंगा सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि हम हिंदुस्तानियों के लिए देवलोक का साक्षात महाप्रसाद हैं। पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक, यह पावन नदी पूरे भारत को राष्ट्रीय एकता के एक पवित्र धागे में पिरोती है। हमारे देश में सदियों से मान्यता है कि जीवन की आखिरी सांसों के वक्त अगर मुंह में गंगाजल की कुछ बूंदें चली जाएं, तो मोक्ष का रास्ता खुल जाता है।ALSO READ: गंगा दशहरा 2026 कब है? जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त और स्नान का सही समय
 
साल 2026 में 25 मई को गंगा दशहरा का महापर्व मनाया जाएगा। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन हस्त नक्षत्र में मां गंगा का स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरण हुआ था। यह दिन सिर्फ शरीर को साफ करने का नहीं, बल्कि मन की शुद्धि का है। इस पावन दिन गंगा के पानी में खड़े होकर अपनी पुरानी गलतियों की माफी मांगनी चाहिए और भविष्य में नेक राह पर चलने का संकल्प लेना चाहिए।
 
आइए इस पावन मौके पर जानते हैं कि आखिर मां गंगा स्वर्ग की ऊंचाइयों को छोड़कर इस मृत्युलोक (धरती) पर क्यों और कैसे आईं। मोक्षदायिनी मां गंगा के धरती पर आने की वो अद्भुत कहानी, जो हर संताप मिटा देती है
 

जब इंद्र की एक चाल ने बदल दिया इतिहास

यह कहानी शुरू होती है प्राचीन काल के अयोध्या से, जहां राजा सगर राज करते थे। उन्होंने सातों समुद्रों को जीतकर अपने साम्राज्य का लोहा मनवाया था। राजा सगर की दो रानियां थीं- केशिनी और सुमति। केशिनी का एक पुत्र था असमंजस, जबकि रानी सुमति के पूरे 60 हजार पुत्र थे।
 
एक बार राजा सगर ने अपनी शक्ति और प्रतिष्ठा को सिद्ध करने के लिए 'अश्वमेध यज्ञ' का आयोजन किया। यज्ञ का घोड़ा छोड़ दिया गया। लेकिन देवताओं के राजा इंद्र घबरा गए कि कहीं सगर का यज्ञ सफल न हो जाए। इंद्र ने छल किया, यज्ञ का घोड़ा चुराया और उसे चुपके से महर्षि कपिल के आश्रम में ले जाकर बांध दिया, जो उस वक्त गहरी तपस्या में लीन थे।ALSO READ: गंगा दशहरा पर बन रहा है इस बार दुर्लभ योग संयोग, इस मुहूर्त में करें स्नान और पूजा
 

कपिल मुनि का क्रोध और 60 हजार राजकुमारों का अंत

घोड़ा गायब होने पर राजा सगर के साठ हजार पुत्रों ने पूरी धरती छान मारी। ढूंढते-ढूंढते वे महर्षि कपिल के आश्रम पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि मुनि आंखें बंद किए बैठे हैं और पास ही उनका यज्ञ का घोड़ा घास चर रहा है। राजकुमारों ने महर्षि को ही चोर समझ लिया और 'चोर-चोर' चिल्लाने लगे।
 
राजकुमारों के इस शोर से महर्षि कपिल की गहरी समाधि टूट गई। जैसे ही क्रोध में भरकर मुनि ने अपनी आंखें खोलीं, उनके नेत्रों से निकली तपोअग्नि ने राजा सगर के सभी 60 हजार पुत्रों को पल भर में जलाकर राख (भस्म) कर दिया।
 

मोक्ष की खोज: पीढ़ियों का संघर्ष

जब काफी समय तक राजकुमार नहीं लौटे, तो राजा सगर के पौत्र अंशुमान उनकी तलाश में निकले। मुनि के आश्रम पहुंचकर जब उन्होंने राख का ढेर देखा, तो उन्हें पक्षीराज गरुड़ जी ने सारा सच बताया। गरुड़ जी ने एक रास्ता भी सुझाया- 'अगर इन साठ हजार पूर्वजों की आत्मा की शांति और मुक्ति चाहते हो, तो स्वर्ग से गंगा जी को धरती पर लाना होगा, क्योंकि उनके पवित्र जल के स्पर्श से ही इन्हें मोक्ष मिल सकता है।'
 
अंशुमान घोड़ा लेकर लौटे और यज्ञ पूरा हुआ। इसके बाद अंशुमान और उनके पुत्र दिलीप ने जिंदगी भर तपस्या की, लेकिन वे गंगा जी को धरती पर लाने में सफल नहीं हो पाए।
 

भगीरथ का वो हठ, जिससे पिघल गए ब्रह्मा और शिव

राजा सगर के वंश में कई राजा आए, सभी ने अपने पूर्वजों की भस्म के उस पहाड़ को गंगाजल से पवित्र करने की कोशिश की, पर नाकाम रहे। आखिरकार, महाराज दिलीप के पुत्र भागीरथ ने ठान लिया कि वे अपने पूर्वजों को तर्पण देकर ही रहेंगे। उन्होंने गोकर्ण तीर्थ में जाकर ऐसी कठोर और असाधारण तपस्या की कि कई वर्ष बीत जाने पर ब्रह्मा जी प्रसन्न हो गए।
 
ब्रह्मा जी ने जब वरदान मांगने को कहा, तो भगीरथ ने बिना कुछ सोचे 'मां गंगा' को धरती पर भेजने की मांग कर दी।
 
ब्रह्मा जी मुस्कुराए और बोले, 'राजन! मैं गंगा को भेज तो दूं, लेकिन जब वे स्वर्ग से नीचे गिरेंगी, तो उनके प्रचंड वेग और गति को संभालने की शक्ति इस पृथ्वी में नहीं है। ब्रह्मांड में केवल भगवान शिव ही हैं जो गंगा के इस वेग को रोक सकते हैं। इसलिए तुम्हें महादेव को मनाना होगा।'
 
भगीरथ ने हार नहीं मानी। उन्होंने शिव जी की आराधना की। भोलेनाथ प्रसन्न हुए और उन्होंने स्वर्ग से उतरती हुई गंगा के घमंड और वेग को चूर करने के लिए उन्हें अपनी विशाल जटाओं में समेट लिया। इसके बाद शिव की जटाओं से शांत होकर मां गंगा धरती पर प्रवाहित हुईं। राजा भगीरथ के इसी अथक प्रयास (भगीरथ प्रयास) के कारण गंगा जी का एक पवित्र नाम 'भागीरथी' भी पड़ा।

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: गंगा दशहरा पर बन रहे हैं दुर्लभ योग संयोग, इस दिन करें ये 5 उपाय
 

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