पृथ्वी दिवस 22 अप्रैल : क्या कहती है धरती हमारी

- डॉ. गिरीशदत्त शर्मा


 

 
बच्चो, आपने पढ़ा है कि जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान है। जानते हो क्यों? तुम्हारी माता ने जन्म देकर, दूध पिलाकर हर प्रकार से सुख देकर जिस प्रकार तुम्हें पाला-पोसा है उसी प्रकार मैं तुम्हारी धरती मां अपने फल-फूल, अन्न, जल, वायु आदि से तुम्हारे सारे मानव जगत को सदियों से पालती-पोसती आ रही हूं।
 
चारों ओर हरे-भरे मेरे आंगन में रंग-बिरंगे फूल, चीं-चीं करती ‍चिड़िया, कल-कल करती नदियां, वन में गर्जन करते दहाड़ते सिंह, उछलते-कूदते हिरण, खरगोश, पंख फैलाकर नाचते मोर जैसे मोहक वातावरण में जन्म लेने को देवता भी ललचाते हैं।
 
राम, कृष्ण, शंकर आदि अनेक देवता मनुष्य रूप में मेरी गोद में खेले हैं और आप लोगों का कल्याण किया है, अच्‍छी दिशा दी है। क्या यह स्वर्ग से बढ़कर मेरी महानता नहीं है? ऐसी अवस्‍था में तुम मेरे बारे में जानने की उत्सुकता जरूर रखते होंगे। आओ, मैं तुमको अपने बारे में बताती हूं।
 
मेरा जन्म कब हुआ? कैसे हुआ? जानना चाहते हो तो सुनो- ऊपर बिना ओर-छोर वाला जो नीला आकाश दिखाई देता है मैं उसी विशाल अंतरिक्ष में एक कण के समान हूं, मेरे जन्म के विषय में अनेक धार्मिक, दार्शन‍िक एवं वैज्ञानिक विचार समय-समय पर आते रहे हैं और अभी भी चल रहे हैं। ईसाई मत के अनुसार मुझे ईश्वर ने स्वर्ग के बाद बनाया। भारतीय भास्कराचार्य ने आकाशीय पिंडों की गति के आधार पर मुझे आकाश में विचरण करने सौरमंडल की आयु 5 अरब मानकर उसके समकालीन बताया। वर्तमान वैज्ञानिकों ने बिग बैंग परिकल्पना के आधार पर उत्पन्न होना बताया। अस्तु, जितने लोग उतने ही विचार।
 
 


 


मेरी आयु की भांति मेरे जन्म के विषय में भी लोगों की भिन्न-भिन्न धारणाएं रही हैं। सर्वप्रथम प्रस्तुत कल्पना के अनुसार आकाश में अकेले सूर्य के सामने जब कोई विशाल तारा आया, तब उसके आकर्षण से सूर्य से कुछ पदार्थ बाहर निकल आया, जो तारे के चले जाने के पश्चात अकेला रह गया और घूमता रहा। यह घूमता पदार्थ ठंडा होकर टुकड़ों में बिखर गया, जो ग्रह और उपग्रह कहलाए। मैं उन्हीं में से एक हूं। 
 
कुछ लोग मेरा जन्म आकाश में बिखरे छोटे-छोटे अणुओं के आपस में इकट्ठे होकर ठोस टुकड़ों के रूप में बन जाने से बताते हैं। कुछ विद्वान मेरा जन्म आकाश में घूमती चमकदार निहारिकाओं से निकलने वाली पट्टियों के ठोस होकर अलग-अलग टुकड़ों में बंट जाने से बताते हैं।
 
एक अन्य विचार के अनुसार सूर्य जैसे तारे में कभी-‍कभी विखंडन होने से टूटे हुए भागों के ठोस होने से मेरे जैसे ग्रहों की उत्पत्ति मानते हैं। कुछ लोगों ने मेरे जन्म में चुम्बकीय परिकल्पना मानी है। उनके अनुसार आकाश में बादलों के रूप में अनेक परमाणु छाए हुए थे, जब सूर्य उसमें से होकर निकला तब उसके चुम्बकीय प्रभाव से ये अणु एकत्रित और संगठित होकर अलग-अलग मेरे जैसे ग्रह बन गए। 
 
मेरे जन्म के विषय में अंतिम परिकल्पना ब्रह्माण्ड का विकासवादी अथवा महाविस्फोट सिद्धांत है। इसके अनुसार बताया गया है कि अब से करोड़ों वर्ष पूर्व अंतरिक्ष में एक विशाल पदार्थ था। 
 
उसमें एक भयंकर विस्फोट हुआ जिससे यह टूटकर छोटे-छोटे टुकड़ों में बिखर गया। बाद में ये कण गुरुत्वाकर्षण से आपस में अलग-अलग समूह में इकट्ठे होकर मेरे जैसे पिंड, ग्रहों के रूप में बन गए। 
 
वर्तमान में इस परिकल्पना में कुछ संशोधन कर इसे 'बिग बैंग' का नाम दिया गया है। पर इतने पर भी अभी लोग संतुष्ट नहीं हो पाए हैं और लगातार नई-नई खोजों और परिकल्पनाओं में लगे हुए हैं।
 
 

मैं जिस परिवार की हूं, उसे सौर परिवार कहते हैं। इसमें मेरे अतिरिक्त मेरे 8 और बहन-भाई हैं ‍जिन्हें बुध, गुरु, शुक्र, मंगल, बृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण और यम नाम दिया गया है। हमारे भी परिवार हैं। इन्हें उपग्रह या चंद्रमा कहते हैं। हम सभी अपने उपग्रहों को साथ लिए सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते रहते हैं। हम भी अपने उपग्रहों को साथ लिए सूर्य के चक्कर लगाते रहते हैं और अपनी-अपनी धुरी पर भी घूमते रहते हैं। जब हम अपनी कीली (धुरी) पर चक्कर लगाते हैं, तो इसमें लगने वाला समय दिन कहलाता है। जितनी देर में हम सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हैं, वह वर्ष कहलाता है। हां, यह बात जरूर है कि हरेक का अपनी कीली पर और सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने का समय अलग-अलग है। अंतरिक्ष में कोई भी ऐसी चीज नहीं है, जो अपनी जगह स्‍थिर हो। यहां तक कि हमारा सूर्य भी अपनी धुरी पर घूमते हुए आकाशगंगा की नाभि के चारों ओर चक्कर लगाता है।
 
सौर परिवार के क्रम के आधार पर बुध और शुक्र के बाद मेरा तीसरा स्थान है, परंतु आकार की दृष्टि से 5वां स्थान है। हमारे में बृहस्पति सबसे बड़ा ग्रह है। सूर्य से मेरी दूरी 14.96 करोड़ किलोमीटर है। इस दूरी को खगोलीय इकाई कहते हैं, जो अंतरिक्ष में पाए जाने वाले ग्रहों के बीच की दूरी को नापने के काम आती है। इस दूरी को प्रकाश वर्ष के द्वारा भी निश्चित करते हैं। प्रकाश 1 सेकंड में 3 लाख किलोमीटर की दूरी तय करता हुआ 1 वर्ष में 9,500 अरब किलोमीटर की दूरी तय कर लेता है।
 
मेरा आकार नारंगी की तरह है। अत: पूरी तरह गोल न होकर ऊपर से नीचे की ओर कुछ दबा हुआ और बीच में उभार लिए है। इसीलिए उत्तर और दक्षिण के बिंदुओं को मिलाने वाली रेखा 12,712 किलोमीटर व्यास तथा बीच का उभार वाला व्यास 12,755 किलोमीटर है।
 
मेरे शरीर का कुल क्षेत्रफल 51,01,00,448 वर्ग किलोमीटर है। इसका 70.78 प्रतिशत भाग जल से ढंका है। केवल 29.22 प्रतिशत भाग सूखा है जिस पर तुम लोगों की दुनिया बसी हुई है। मेरे शरीर का घनापन पानी की तुलना में 5.517 है तथा शरीर की औसत गर्मी 59 डि. सेल्सियस है।
 
मेरा वजन 6,60,00,00,00,00,00,00,00,00,000 टन है। मेरा शरीर सीधा न होकर सतह पर 23-2/3 झुका हुआ है और सूरज के चारों ओर चक्कर लगाने से अंडाकार मार्ग पर यह झुकाव 66-1/2 हो जाता है। मेरे झुकाव के कारण ही सब जगह दिन-रात और ऋतुएं एक-सी नहीं होती हैं। मैं अपनी धुरी पर 23 घंटा 56 मिनट और 4 सेकंड में एक बार घूम जाती हूं। इसी कारण तुम्हारा दिन 24 घंटे का माना गया है। 
 
 

सूरज के चारों ओर चक्कर लगाने में मुझे 365-1/4 दिन लगते हैं। यह संख्या पूर्णांक में न होने के कारण 1 वर्ष की अ‍वधि 365 दिन 3 वर्ष तक रहती है। चौथा वर्ष 366 दिन का होता है, क्योंकि चौथे वर्ष फरवरी माह 28 दिन का न होकर 29 दिन का होता है।
 
अपनी मानचित्रावली में मेरे गोल चित्र में कुछ रेखाएं दिखाई जाती हैं, वे वास्तविक नहीं हैं। स्थान, क्षेत्र और समय की जानकारी के लिए इनको मान लिया गया है। उन्हें अक्षांश और देशांतर रेखाएं कहते हैं। उत्तर से दक्षिण ध्रुवों को मिलाती खड़ी रेखाएं देशांतर कहलाती हैं जिनकी कुल संख्या 360 है। जो आड़ी रेखाएं पूर्व से पश्चिम की ओर खिंची रहती हैं, वे अक्षांश कहलाती हैं। इनकी कुल संख्या 90 उत्तर तथा 90 दक्षिण मिलाकर 180 है। इन रेखाओं द्वारा ही तुम लोग अपनी स्थिति और समय आदि को जान पाते हो।
 
मैं अपने जन्म से लगातार घूमती कैसे रहती हूं? यह बात बता दूं। मेरे जैसे प्रत्येक आकाशीय पिंड में 3 शक्तियां होती हैं। एक आकर्षण शक्ति, दूसरी अपकेंद्रीय बल और तीसरी जड़त्व का सिद्धांत। इसमें आकर्षण शक्ति और बाहर जाने की शक्ति (घूमने के कारण) उपकेंद्रीय बल से हम लोग अपने-अपने स्थान पर टिके हुए हैं और गति जड़त्व के आधार पर निरंतर बनी हुई है।
 
जिस प्रकार क्रिकेट की गेंद फेंकने वाला गेंद को अपनी अंगुलियों से स्पिन (घुमा) कर देता है उसी के अनुसार गेंद आखिर तक घूमती जाती है। उसी प्रकार हमारे में लगातार आरंभ में घूमने के कारण गति बनी हुई है।
 
चलते-चलते एक बात और बता दूं। हम (ग्रह) जिस तारे (सूर्य) के चारों ओर चक्कर लगाते हैं उसमें तो प्रकाश और गर्मी होती है, परंतु आकाश में हम दूर से चमकते तो जरूर हैं, लेकिन सूर्य की तरह दूसरों को प्रकाशित नहीं कर सकते और हमारा चंद्रमा (उपग्रह) न चमकता है और न दूसरों को प्रकाशित ही कर पाता है। हमारा चन्द्रमा तो सूरज के प्रकाश से प्रकाशित होकर ही चमक पाता है और इसके प्रकाश को ही परावर्तित कर पाता है।
 
अब जरा ग्लोब उठाकर देखो। तुम्हें इस पर पूर्व से पश्चिम की खिंची हुई कुछ रेखाएं दिखाई देंगी। उनमें कर्क रेखा, मकर रेखा, उत्तरी ध्रुव वृत्त एवं दक्षिणी ध्रुव वृत्त विशेष रूप से प्रदर्शित रहते हैं। इन रेखाओं का निर्धारण सूर्य की स्थिति के आधार पर किया गया है। कर्क रेखा उत्तरी गोलार्ध में 23-1/2 अक्षांश पर इसलिए है‍ कि सूर्य की लंबवत किरणें इसी सीमा तक पड़ती हैं, इसके आगे सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं। 
 
दक्षिणी गोलार्ध में मकर रेखा भी इसी प्रकार 23-1/2 अक्षांश पर निर्धारित की गई है। दोनों गोलार्धों में ध्रुव व्रत 66-1/2 अंश पर ही निर्धा‍रित है, जहां तक दिन और रात की लंबाई 24 घंटे तक हो जाती है। इससे आगे दिन की लंबाई बढ़ती जाती है, जो ध्रुवों पर जाकर 6 महीने के दिन अथवा 6 महीने की रात के रूप में होती है।


साभार- देवपुत्र  

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