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आखिर ये ब्रॉन्कायटिस है क्या?

- डॉ. के.के. पाण्डेय

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क्या कभी आपको न्यूमोनिया का इन्फेक्शन हुआ था? इन्फेक्शन तो नियंत्रण में आ गया, पर न थमने वाली खाँसी का दौर शुरू हो गया। बुखार तो नहीं है पर खाँसी के साथ बलगम की शिकायत जारी है। क्या कभी ऐसा भी हुआ है कि आप फेफड़े की टी.बी. इन्फेक्शन के शिकार हुए हों, जो कुछ महीने की दवा के बाद नियंत्रण में आ गया हो और टी.बी. का इन्फेक्शन समाप्त होने के बाद भी खाँसी बरकरार रही हो। कहीं आप 14 साल की उम्र से निरंतर खाँसी व बलगम के शिकार तो नहीं रह रहे हैं?

कभी-कभी खाँसी के साथ बलगम व खून भी आया हो या कभी खाँसी के साथ खून की मात्रा ज्यादा निकली हो। बुखार तो नहीं है पर खाँसी बलगम से पीड़ित है और ये बलगम की मात्रा जाड़े में सुबह के समय बहुत ज्यादा हो जाती हो। ये सब लक्षण एक ही तरफ इंगित करते हैं कि आप फेफड़े की ब्रॉन्कायटिस नामक बीमारी से ग्रसित हैं। ब्रॉन्कायटिस रोग को गंभीरता से लें अन्यथा इसके दुःखदायी परिणाम झेलने पड़ सकते हैं।

ब्रॉन्कायटिस है क्या?

ब्रॉन्कायटिस फेफड़े के अंदर स्थित श्वास की नलियों की सूजन व मियादी इन्फेक्शन है। इसमें श्वास नली की दीवारें इन्फेक्शन व सूजन की वजह से अनावश्यक रूप से कमजोर हो जाती हैं जिसकी वजह से इनका आकार नलीनुमा न रहकर गुब्बारेनुमा या फिर सिलेंडरनुमा हो जाता है। फलस्वरूप ये दीवारें इकट्ठा हुए बलगम को बाहर ढकेलने में असमर्थ हो जाती हैं।

इसका परिणाम यह होता है कि श्वास की नलियों में गाढ़े बलगम का भयंकर जमाव हो जाता है, जो नलियों में रुकावट पैदा कर देता है। इस रुकावट की वजह से नलियों से जुड़ा हुआ फेफड़े का अंग बुरी तरह क्षतिग्रस्त व नष्ट होकर सिकुड़ जाता है या गुब्बारेनुमा होकर फूल जाता है। क्षतिग्रस्त भाग में स्थित फेफड़े को सप्लाई करने वाली धमनी व गिल्टी भी आकार में बड़ी हो जाती है। इन सबका मिला-जुला परिणाम यह होता है कि क्षतिग्रस्त फेफड़ा व श्वास नली अपना कार्य सुचारू रूप से नहीं कर पाते और मरीज के शरीर में तरह-तरह की जटिलताएँ पैदा हो जाती हैं।

ब्रॉन्कायटिस क्यों होता है?

भारतवर्ष में ब्रॉन्कायटिस नामक बीमारी होने का मुख्य कारण छाती में स्थित श्वास नली व उसकी शाखाओं में बार-बार होने वाला इन्फेक्शन है। इन इन्फेक्शनों में न्यूमोनिया का इन्फेक्शन प्रमुख है। अगर इस इन्फेक्शन को शुरुआती दिनों में प्रभावी ढंग से रोका नहीं गया तो ब्रॉन्कायटिस होने की संभावना खड़ी हो जाती है।

दूसरा कारण टी.बी. का इन्फेक्शन है। समुचित दवा के बाद टी.बी. का इंफेक्शन तो नियंत्रण में आ जाता है, पर फेफड़ा व उसमें स्थित श्वास नली पर जाते-जाते अपना स्थिर प्रभाव छोड़ जाता है। इसकी वजह से श्वास नली व फेफड़े की संरचना में बदलाव आ जाता है, जिससे दूसरे किस्म के कीटाणु वहाँ अपना डेरा जमा लेते हैं और धीरे-धीरे श्वास नली के कार्य में बाधा डालते हैं। यहीं से ब्रॉन्कायटिस की शुरुआत होती है। कुछ लोगों में ब्रॉन्कायटिस की बीमारी जन्मजात होती है, जैसे सिस्टिक फाइब्रोसिस नामक रोग बच्चों में होने वाली ब्रॉन्कायटिस का एक बहुत बड़ा कारण है।

   ब्रॉन्कायटिस फेफड़े के अंदर स्थित श्वास की नलियों की सूजन व मियादी इन्फेक्शन है। इसमें श्वास नली की दीवारें इन्फेक्शन व सूजन की वजह से अनावश्यक रूप से कमजोर हो जाती हैं ...      
कभी-कभी खून में एक जरूरी तत्व ऐल्फा-1, ऐन्टीट्रिप्सिन नामक एन्जाइम की कमी होना, रयूमेटाइड ऑर्थराइटिस और अन्य आटोइम्यून बीमारियाँ भी ब्रॉन्कायटिस के उत्पन्न होने का एक बहुत बड़ा कारण बनती हैं। कभी-कभी बच्चे अंजाने में चना, मटर या सिक्का या कोई अन्य छोटी वस्तु मुँह में डाल लेते हैं जो भोजन की नली में न जाकर श्वास नली में चली जाती हैं और नीचे जाकर फेफड़े में स्थित श्वास नली में अटक जाती है। यहीं से उस बंद श्वास नली से जुड़े हुए फेफड़े के हिस्से में ब्रॉन्कायटिस की शुरुआत हो जाती है।

  ब्रॉन्कायटिस के इलाज में ऑपरेशन की महत्वपूर्ण भूमिका है। अगर फेफड़े का कोई भाग ब्रॉन्कायटिस की वजह से नष्ट हो गया है तो उसको किसी थोरेसिक सर्जन से जल्दी से निकलवा देने में बुद्धिमानी है ....      
ब्रॉन्कायटिस के लक्षण

*बार-बार छाती में इन्फेक्शन होना।

*साँस फूलना।

*न थमने वाली व काफी देर तक चलने वाली खाँसी जो बेहाल कर दे।

*खाँसी के साथ बहुत गाढ़ा व मवादनुमा बलगम का आना।

*कभी-कभी केवल सूखी खाँसी का निरंतर आना और साँस लेते समय छाती में गड़-गड़ की आवाज होना।

अगर आप ब्रॉन्कायटिस के शिकार हैं तो क्या करें?

अगर आप ब्रॉन्कायटिस के लक्षणों से पीड़ित हैं तो तुरंत किसी थोरेसिक सर्जन से सलाह लें और हमेशा ऐसे अस्पताल में जाएँ जहाँ अत्याधुनिक जाँच सुविधाएँ, जैसे ब्रॉन्कोस्कोपी, थोरकोस्कोपी, स्पाइरल सी.टी., एंजियोग्राफी और ब्रॉन्कियल आरटरी इम्बोलाइजेशन की उपलब्धता हो। ब्रॉन्कायटिस में चेस्ट एक्सरे और स्पाइरल सी.टी. की बड़ी अहम भूमिका है। इन सब जाँचों से निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि फेफड़े व श्वास नली का कौन-सा हिस्सा रोगग्रस्त है व नष्ट हो चुका है। इन सब जाँचों से मिली जानकारी से ब्रॉन्कायटिस बीमारी के इलाज का सही दिशा निर्धारण हो सकता है।

ब्रॉन्कायटिस का सही इलाज क्या है?

ब्रॉन्कायटिस से ग्रस्त मरीजों को चाहिए कि वे किसी अनुभवी थोरेसिक यानी चेस्ट सर्जन से स्वयं जाकर परामर्श लें या फिर अपने इलाज करने वाले फिजीशियन से आग्रह करें कि वे उन्हें किसी थोरेसिक सर्जन को दिखवा दें। ब्रॉन्कायटिस के प्रभावी इलाज के लिए उसके कारणों को ढूँढ कर उन पर नियंत्रण किया जाए। इस मर्ज के इलाज के लिए एंटीबायटिक का सही ढंग से इस्तेमाल होना चाहिए।

क्षतिग्रस्त श्वास नली में जमे हुए गाढ़े बलगम को निकालने की हरसंभव कोशिश करनी चाहिए। कुछ विशेष शारीरिक मुद्राएँ व फिजियोथेरेपी भी बलगम को बाहर निकालने में प्रभावी ढंग से मदद करती हैं।

ब्रॉन्कायटिस के इलाज में ऑपरेशन की महत्वपूर्ण भूमिका है। अगर फेफड़े का कोई भाग ब्रॉन्कायटिस की वजह से नष्ट हो गया है तो उसको किसी थोरेसिक सर्जन से जल्दी से निकलवा देने में बुद्धिमानी है, नहीं तो आस-पास का स्वस्थ फेफड़ा भी रोगग्रस्त हो जाएगा। नष्ट हुए फेफड़े के हिस्से को छाती में छोड़ देना उचित नहीं है।

कभी-कभी मरीज को खाँसी के साथ भयंकर रक्तस्राव होता है जिससे मरीज की जान भी जा सकती है। इसलिए मरीज को चाहिए जैसे ही खाँसी के साथ आए हुए खून की मात्रा बढ़ जाए तो हाथ पर हाथ धर कर न बैठें और तुरंत किसी थोरेसिक सर्जन से परामर्श लें जिससे रक्तस्राव पर प्रभावी नियंत्रण किया जा सके और मरीज की जान बच सके।

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