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'हाऊ टू रिमेन एवर हैप्पी' : खुशियों का पता देती किताब

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हमें फॉलो करें 'हाऊ टू रिमेन एवर हैप्पी
हेमलता दिखित   
 
आजकल सेल्फ हेल्प और हेल्थ केयर किताबें न केवल खूब आ रहीं हैं, बल्कि वे खूब पढ़ी भी जा रहीं हैं।  इंजीनियर एम. के गुप्ता इस संदर्भ में एक परिचित नाम है। 'हाऊ टू रिमेन एवर फ्री','हाऊ टू कन्ट्रोल माइन्ड एन्ड बी स्ट्रैस फ्री' और 'हेल्थ केयर' उनकी प्रसिद्ध किताबें हैं। इसी कड़ी में उनकी 'हाऊ टू रिमेन एवर हैप्पी' पढ़ने को मिली। इसमें गुप्ता जी ने हमेशा खुश रहने के कुछ टिप्स और सुझाव दिए हैं। इसे कहीं से भी पढ़ा जा सकता है, क्योंकि हर अध्याय अपने में एक पूरी बात कहता है।

खुशी एक मानसिक स्थिति है, जो किसी वस्तु या किसी स्थान में नहीं होती है। यह एक भाव है जो प्रैक्टिस से आता है। वैसे आनंद हमारा सच्चा आंतरिक स्वभाव है, लेकिन स्थिति, स्वभाव और व्यवहार के कारण हम इसे अनुभव नहीं कर पाते हैं। हम खुद ही अपने आप को खुश रख सकते हैं, कोई दूसरा नहीं। जो स्वयं खुश है, वही दूसरों को खुशी दे सकता है। पैसा सुविधा दे सकता है, खुशी नहीं। खुशी के लिए संतोष एक आवश्यक फैक्टर है। खुशी इच्छाओं की पूर्ति में नहीं, उनकी निवृति से आती है। इसके लिए ज्ञान, शक्ति और आत्मबल की जरुरत होती है। खुश रहने के लिए एक सीख पैसा, इच्छाएं और सुख-सुविधाओं के पीछे नहीं भागने की दी है, क्योंकि इनका कोई अंत नहीं है। हम दुख या कठिनाई का सामना कैसे करते हैं, इससे हमारे सुख को नापा जाता है। खुशी जो हम करना चाहते हैं उसमें नहीं, बल्कि जो किया जाना चाहिए उसमें होती है। यह छोटी-छोटी सी बातों -जैसे किसी की मदद करने, मित्र का पत्र मिलने, सूर्यकिरण, अच्छे संगीत या सुन्दर पेंटिंग में होती है।
 
खुश रहने के लिए पहला टिप है 'कंसन्ट्रेशन', इससे मानसिक शक्ति बढ़ती है और सशक्त मन बाहरी चीजों से डिस्टर्ब नहीं होता है। एकाग्रता का अर्थ है वर्तमान में स्थित रहकर बाहरी चीजों से 'डिटैच' रहना। लेखक कहता है जीवन छोटा है और समय कीमती। इसे बरबाद न करें। भूत से सबक सीखें, भविष्य के लिए प्लानिंग करें, पर जिएं वर्तमान में। कष्ट और समस्या में भी जीवन का फ्लो न रोकें, वर्ना जब तक हम वापस नॉर्मल होंगे, उतने समय का नुकसान तो हो चुकेगा। बरबादी किसी भी चीज-पानी, बिजली, पैसा, कागज,खाना-की उचित नहीं है। संसार एक बड़ा ट्रेनिंग सेंटर है, जहां सतत शिक्षा मिलती रहती है। माता-पिता, गुरुजन, संतों, विद्धानों, पुस्तकों और दूसरों के ज्ञान, अनुभव और टैलेन्ट से हमें सीख मिलती है, हमें केवल अपना दिल-दिमाग खुला रखना चाहिए। शिक्षा का अंतिम उद्देश्य आत्म ज्ञान और चेतना का विस्तार है। बेस्ट दें और बेस्ट लें। उत्तम बनने के लिए उत्तम का संग करें। हमारे शास्त्रों में सत्संग की महिमा बताई गई है। अच्छी कंपनी हमें एक बेहतर इंसान बनाती है।

याद रखना अच्छा और उपयोगी हो सकता है, मगर भूलना हमेशा बेहतर होता है। मोह या अटैचमेंट को हमारे सारे कष्टों का कारण बताया गया है। हमें चीजों और लोगों दोनों से ऑब्जेक्टिवली डील करते आना चाहिए। बंधन मुक्त होना खुशी की पहली सीढ़ी है। कोई भी स्थिति या समस्या स्थायी नहीं होती है। उससे सबक लेकर हमें मजबूत बनना चाहिए।
 
संसार एक व्यवस्था, एक ऑर्डर है जो कार्य-कारण परिणाम से बंधा है। यहां अच्छा-बुरा कुछ नहीं होता है। जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि। अतः सकारात्मक रवैया रखकर अच्छा सोचना चाहिए। विचारों में बहुत शक्ति होती है। एकांत  हमें आत्म-निरीक्षण, विकास और सुधार का मौका देता है। अकेले में बोर न हों। हमें अपने आपके साथ भी खुश रहते आना चाहिए। इससे शांति मिलती है और मानसिक ऊर्जा भी बढ़ती है। दूसरे हमारे बारे में क्या सोचते हैं इसकी चिंता छोड़कर हम स्वयं अपने बारे में क्या सोचते हैं, यह महत्वपूर्ण है। जो स्वयं को प्यार करता है वही दूसरों को प्यार करता है। जो खुद की इज्जत करता है वही दूसरों की इज्जत करता है। मगर आत्म केंद्रित होकर हम केवल आय, मी और माइन तक ही सीमित ना रह जाएं। हम समाज में रहते हैं और उससे बहुत कुछ लेते हैं। हमारी कोशिश होना चाहिए कि हम जितना लेते हैं, उससे अधिक लौटा कर जाएं। वह किसी भी रुप में हो सकता है-पैसा, ज्ञान, सेवा या परोपकार। लेखक ने एक मजेदार बात कही है कि जो हम बचाते हैं, वह खर्च होता है और जो खर्च करते हैं, वही बचाते हैं। यह गलत नहीं है। हम जितना अधिक देते हैं, उतना अधिक पाते हैं। यदि हम किसी की मदद या सेवा कर पाते हैं तो हमें कृतज्ञ होना चाहिए कि ईश्वर ने हमें इसका माध्यम बनाया। इस भाव से अहंकार नहीं आता है। नाम, पद, प्रतिष्ठा आदि सभी क्षणिक हैं, इनका न कभी गर्व करें, न दुरुपयोग।
 
जो दूसरे कर सकते हैं, वह हम भी कर सकते हैं, यह भाव आत्म-विश्वास जगाकर हीन भावना मिटाता है। हर इंसान एक अलग मकसद और अलग काम के लिए बनाया गया है, अतः दूसरों से तुलना व्यर्थ है। डर हमारी ही निर्मित एक स्थिति है। हमें उस पर काबू पाते आना चाहिए। एक सीख आवेगों पर काबू है। आत्म नियंत्रण और धैर्य से मन और इन्द्रियों पर काबू रहता है। ये दोनों गुण सुखी और संतुष्ट जीवन के लिए जरुरी हैं। खुश रहने के लिए जरुरी है कि हम अप्रिय स्थिति में तुरन्त रिएक्ट न करें, क्योंकि उत्तेजना में तर्क शक्ति ठीक से काम नहीं करती है। हम अपना भाग्य स्वयं अपने कर्म, वचन और विचारों से बनाते हैं। अपनी किसी भी कमजोरी या असफलता के लिए कभी दूसरों को दोष नहीं देना चाहिए। कोई भी व्यक्ति परफेक्ट नहीं होता है। हमें अपनी कमजोरियां और सीमाएं स्वीकार करते आना चाहिए। स्वतंत्र व्यक्तित्व के लिए केवल अलग दिखना ही नहीं, अलग करना भी जरुरी है। कभी-कभी ना कहना भी सीखें। हम यहां दूसरों और संसार को सुधारने नहीं, अपना काम और कर्तव्य पूरा करने आएं हैं। केवल दिखावे के लिए बेकार की चीजों का संग्रह अच्छा नहीं है। उन्हें संभालने में समय और शक्ति दोनों नष्ट होते हैं और तनाव बढ़ता है।  
 
अच्छा स्वास्थ्य खुशी की पहली शर्त है। उसके लिए भोजन पर नियंत्रण, फल, सब्जी और पानी का अधिक सेवन जरुरी है। नियमित व्यायाम, योग, ध्यान, प्राणायाम और एरोबिक्स से शारिरिक और आत्मबल दोनों बढ़ते हैं। डेली रुटीन से ब्रेक भी खुशी देता है। साफ घर, कपड़े और बिस्तर से ही सही आराम मिलता है। हम किसी भी संसारिक चीज के स्थायी मालिक नहीं, बल्कि थोड़ी देर के लिए उनके केयर टेकर हैं, अतः उनका मोह या लालच नहीं करना चाहिए। शरीर मन के आधीन रहता है अतः उस पर कंट्रोल करना चाहिए। इससे तनाव घटता है। मृत्यु एक सामान्य प्रक्रिया है उससे डरने की जरुरत नहीं है। 
 
रंगों का जीवन में अपना महत्व है। वे हमारी मानसिकता, स्वभाव ओर व्यक्तित्व जाहिर करते हैं। सॉफ्ट संगीत मन को सुकून देता है। आवाज और उसके उतार-चढ़ाव का मन पर बहुत असर होता है। कम बोलें, धीरे बोलें, और मीठा बोलें। इससे बोलने और सुनने वाले दोनों को सुख मिलता है। प्रकृति का साथ, हरियाली, शुद्ध हवा आदि मन को प्रसन्न रखते हैं और प्रसन्न मन शरीर को फिट रखता है। एक और सीख अपनी समस्याओं को खुद निपटाना है। दूसरों को तभी बताएं, जब जरुरी हो अन्यथा मदद नहीं मिलने पर हम दुखी होंगे। नम्रता एक बड़ा गुण है।  धन्यवाद और सॉरी दोनों पक्षों को सुख देते हैं। महानता पद से नहीं, गुणों से आती है।

मन को शांत और स्थिर रखने के लिए जैसे हम टी.वी के चैनल्स बदलते हैं, वैसे ही विचारों और मूड्स को बदलते आना चाहिए। एक ही बात सोचने से तनाव बढ़ता है। पक्षपात और फेवर दोनों ही गलत हैं। किसी भी व्यक्ति की एक बात या एक काम से नहीं, उसके सभी कामों से उसके व्यक्तित्व का आकलन करना चाहिए। हमें परिवर्तन को स्वीकार करना चाहिए क्योंकि वह जीवन और प्रकृति दोनों का नियम है। लेखक ने आदत, व्यवहार और स्वभाव में प्रैक्टिस से सुधार करके हमें काफी हद तक सुखी जीवन की राह दिखाई है। 

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