हमारी भाषा पराई क्यों है?

शैली अजमेरा

हिन्दी क्या है...। इस प्रश्न के उत्तर में मस्तिष्क में कई जवाब उमड़-घुमड़ रहे हैं। लेकिन जवाबों की उथल-पुथल में एक जवाब मुझे बेहद सटीक लग रहा है। मुझे लगता है हिन्दी एक हाथी की तरह है। वह इसलिए क्योंकि हिन्दी पर भारत की 35 लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था का आधा हिस्सा टिका है। यानी अर्थव्यवस्था का आधा भाग हिन्दी के बाजार से चल रहा है।

इतना ही नहीं, 29 हजार करोड़ का टीवी कारोबार भी इसी भाषा पर टिका है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब तो अंगरेजी चैनल भी हिन्दी के विज्ञापन दिखाने लगे हैं। ...और तो और, भारत जैसे देश में जहां पढ़े-लिखों की संख्या सिर्फ अढ़तालीस करोड़ है, वहां 18 करोड़ लोग रोजाना हिन्दी का अखबार खरीदते हैं। दुनिया की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री भी हमारे यहां हैं, जहां सालाना 600 नई फिल्में बनती है जिनमें हिन्दी की लगभग 150 फिल्में शामिल हैं जिससे हजारों करोड़ का कारोबार होता है।

बहरहाल, हिन्दी एक हाथी की तरह क्यों है? क्योंकि हाथी की तरह हिन्दी की सूंड पकड़कर फिल्म वाले बता रहे हैं कि हिन्दी की फिल्मों में अंगरेजी का प्रयोग कैसे किया जाए। हिन्दी का पैर पकड़कर टीवी वाले खासकर खबरिया चैनल लोगों को बता रहे हैं कि किस तरह से हिन्दी के नाम पर आप कैसी भी खबरें परोस सकते हैं। हिन्दी के विशाल धड़ की आड़ में अखबार व पत्रिकाएं सरकारें बनाती व बिगाड़ती हैं और कम से कम इस भाषा का दम तो भरती हैं।

इसकी पूंछ पकड़ कर विज्ञापन वाले व्याकरण की कोई भी वेतरणी पार कर जाते हैं। ...और इन सबके बीच पूंछ के दो-चार बाल पकड़ कर हिन्दी लिखने वाले, पढ़ने वाले और इससे प्यार करने वाले मातृभाषा की अस्मिता बनाए रखने के लिए पुरजोर प्रयासरत हैं।

इसी संदर्भ में हमनें बात की हिन्दी के विशेषज्ञों से और जाना कि अपने ही लोगों के बीच अपनी यह भाषा पराई क्यों हैं? क्यों इसी के साथ वह सारे खेल किए जाते हैं जो दूसरी किसी भाषा के साथ मुमकिन नहीं।

हिन्दी का अस्तित्व है खतरे में
- वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रभाकर श्रोत्रिय
वर्तमान में हिन्दी भाषा स्वयं के हित में नहीं बल्कि बाजार के हित में तैयार हो रही है। लोग हिन्दी का प्रयोग करके उसका बाजार फैलाना चाहते हैं। वर्तमान में हिन्दी बाजार के उद्देश्य से चल रही है, इसका जीवंत उदाहरण यह है कि इसे बोली में तब्दील कर दिया गया है व इसके भाषिक रूप को नष्ट किया जा रहा है। समय के हिसाब से भाषा में परिवर्तन आता है लेकिन उसमें किसी अन्य भाषा को थोपना कहां तक उचित है।

हिन्दी का बाजारीकरण करने को उतारु लोग उसे लिपि से अलग करने की कोशिश कर रहे हैं। अब लोग हिन्दी को रोमन लिपि में पढ़ते हैं। हिन्दी फिल्मकार और अदाकार हिन्दी फिल्में बनाते व उसमें काम करते हैं लेकिन उसकी स्क्रिप्ट अंगरेजी में होती है।

हिन्दी पढ़ना तो क्या उन लोगों को ठीक से हिन्दी बोलना भी नहीं आती। मनोरंजन ही नहीं मीडिया, शिक्षा जैसे क्षेत्रों में भी स्थिति यही है। ये सारी बातें भाषा के खिलाफ है। भाषा का विकास उसके लगाव से होता है। अब जब लोगों को अपने स्वार्थ से लगाव है तो भला हिन्दी या उससे प्यार करने वालों का भला कैसे हो सकता है। इस लिहाज से देखें तो केवल हिन्दी ही नहीं वरन समूची भारतीय भाषाओं का अस्तित्व खतरे में है।

शुद्धतावाद नहीं, चाहिए प्रबुद्धतावाद
- वरिष्ठ कवि श्री अशोक चक्रधर
फिलहाल हिन्दी भाषा से केवल उन लोगों का भला हो रहा है जो इससे 'लाभ' कमाना जानते हैं। अगर सचमुच में हमें हिन्दी भाषा का बाजार बढ़ाना है और उसे बोलने-सुनने-समझने वालों का भला करना है तो हमें जागृत होने की जरुरत है। हिन्दी को शुद्धतावाद नहीं बल्कि प्रबुद्धतावाद की जरुरत है।

विकास में विकृति तो आती है
- कवि श्री सरोज कुमार
- हिन्दी अभिव्यक्ति की एक भाषा है जो जीवन के अनेक पहलुओं में काम आती है। हिन्दी में व्याप्त विकृतियों की बात करें तो वह लाजमी है क्योंकि जीवित भाषा जब भी विकसित होती है तो उसमें विकृतियां आती ही हैं। यह विकृतियां ठीक उसी तरह होती है जैसे पवित्र नदी गंगा मैदान में आने पर मैली होती है। इस भाषा में अन्य भाषाओं के शब्द सम्मिलित करने में कोई एतराज नहीं होना चाहिए बस ध्यान रखने योग्य बात यह है कि इसका व्याकरण बना रहना चाहिए। उसके साथ छेड़-छाड़ नहीं होनी चाहिए।

सिर्फ एक दिन हिन्दी क्यों
- वरिष्ठ कथाकार मालती जोशी
माना की हिन्दी का बाजारीकरण हो रहा है लेकिन यह भी सच है कि कम से कम मनोरंजन के इन माध्यमों से हिन्दी भाषा जीवित तो हैं। हम जैसे लोगों का इस भाषा से भला इसलिए नहीं हो रहा क्योंकि सालभर तो हम निश्चिंत रहते हैं और हिन्दी दिवस पर हम ठीक उसी तरह से न हिन्दीमय होते हैं जिस तरह से 15 अगस्त या 26 जनवरी को हममें देशभक्ति का उफान आता है। कोई इससे कितना मुनाफा कमा रहा है यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि यह कि उस माध्यम से इस भाषा का कम से कम प्रचार तो हो रहा है।

ग्यारह नहीं, इलेवन समझते हैं
- कवि श्री अतुल ज्वाला
- वर्तमान में हिन्दी की जो दुर्गति हो रही है उसके लिए केवल एक पक्ष जिम्मेदार नहीं है। आधुनिकता के नाम पर बच्चों पर अंगरेजी थोपी जा रही है। उसे एक और एक ग्यारह समझ नहीं आएगा लेकिन वो वन प्लस वन इलेवन जल्दी से समझ लेगा। इतना ही नहीं हमारे सच्चे आधार स्तंभ राजनीति में भी असंसदीय भाषा का प्रयोग हो रहा है जो मातृभाषा को विकृत बनाने के लिए निश्चित ही जिम्मेदार है। हमारी भाषा को सबसे अधिक प्रभावित कर रही है फिल्में और टीवी, जो कहने को हिन्दी फिल्में होती है लेकिन जिसके शीर्षक से लेकर गीतों तक में अंगरेजी का बोलबाला रहता है।

ममता को छोड़, वासना के स्पर्श पर आ गए
मर्यागित लोग अश्लीलता के निष्कर्ष पर आ गए
इतना गिरा दिया हिन्दी के मोल को हमनें
आधुनिकता की दौड़ के लिए अर्श से फर्श पर आ गए।

मातृभाषा रह गई है 'मात्र' भाषा
- व्यंग्यकार श्री गोविंद राठी
हिन्दी हमारी मातृ भाषा थी मगर आज यह 'मात्र' भाषा बनकर रह गई है। व्यंग्यात्मक लहजे में कहूं तो हिन्दी भाषा में हमेशा पासिंग मार्क्स लेकर उत्तीर्ण होने वाला शख्स मैं स्वयं हिन्दी साहित्य के मंच पर व्यंग्यकार के रुप में ससम्मान स्थापित हूं। भला हो उस सरकार का जिसने हिन्दी भाषा को अनिवार्य विषय में रखा। हिन्दी साहित्य के मंच से जब कोई महंगा कवि यह कहकर कि चार पंक्तियां सुना रिया हूं या अब टिका लो या अब घर जाकर भी क्या कर लोगे जैसी हल्की टिप्पणियों का प्रयोग करते हैं तो श्रोता हल्का हो जाता है और उनका लिफाफा भारी।

मंच पर हमारा बस चले तो हम उर्दू की गजल भी हिन्दी साहित्य में पढ़ दें। अंत में फिर भी हमारे लिए सबसे अच्छी बात यह है कि बच्चा जन्म लेकर जो सबसे पहला शब्द मां बोलता है, हिन्दी भाषा का है और वो अपना अंतिम सफर भी हिन्दी भाषा के 'राम नाम सत्य है' के साथ ही करता है।

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