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ख्‍यात कलाकारों के सम्‍मान के साथ खजुराहो में 47वें नृत्य समारोह का शुभारंभ

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Jatin goswami. Uma sharma
हम इन कलाकारों को सम्मानित करते हुए खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहें हैं। मध्यप्रदेश भिन्न-भिन्न संस्कृतियों से मिलकर बना प्रदेश है। समाज के हर व्यक्ति को अपनी इस सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में अपना योगदान देना होगा

47वें खजुराहो नृत्य समारोह का शुभारंभ 20 फरवरी गुरुवार को किया गया। इस अवसर पर डॉ. विजयलक्ष्मी साधो, मंत्री संस्कृति, चिकित्सा शिक्षा एवं आयुष विभाग ने अपने उद्बोधन में यह बात कही। उन्होंने यहां एम्फी थिएटर बनाने की घोषणा भी की।

इस कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत निदेशक उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी मप्र शासन के अखिलेश ने किया। पुरस्कृत कलाकारों का प्रशस्ति वाचन प्रमुख सचिव संस्कृति पंकज राग ने किया।

उस्ताद अलाउद्दीन खां अकादमी से प्रकाशित ‘कलावार्ता’ पत्रिका के अतिथि संपादक और वरिष्‍ठ लेखक राजेश्‍वर त्रिवेदी ने बताया कि मप्र शासन संस्कृति विभाग के इस 7 दिवसीय प्रतिष्ठा आयोजन में भारतीय शास्त्रीय नृत्यों की प्रमुख शैलियों कथक, ओडिसी, भरतनाट्यम, मणिपुरी,कुचिपुड़ी व सत्रिया की प्रस्तुतियां का आयोजन होगा। इस समारोह की उद्घघाटन संध्या पर सुप्रतिष्ठित कथक नृत्यांगना गुरु उमा शर्मा को वर्ष 2017 के लिए एवं सत्रिया के वरिष्ठ नृत्य गुरु जतिन गोस्वामी को 2018 के मध्यप्रदेश शासन द्वारा शास्त्रीय नृत्य के क्षेत्र में स्थापित राष्ट्रीय कालिदास सम्मान से विभूषित किया गया। इस सम्मान के अंतर्गत दोनों कलाकारों को दो लाख रुपए की राशि एवं सम्मान पट्टिका प्रदान की गई।

जतिन गोस्वामी: गुरु जतिन गोस्वामी की प्रतिष्ठा एक वरिष्ठ नर्तक एवं कोरियोग्राफर के रूप में है। उनका जन्म 2 अगस्त 1933 को असम में हुआ। उन्होंने नृत्य शिक्षा अपने पिता और वरिष्ठ गुरुओं से प्राप्त की। कम उम्र से ही इनको नृत्य के प्रति लगाव था। आगे चलकर उन्होंने उत्तर-पूर्व के सत्रिया नृत्य को देशव्यापी प्रतिष्ठा प्रदान की। उनका स्थान एक दुर्लभ नृत्य परंपरा को उत्कृष्टता एवं संरक्षित करने के लिए किए गए योगदान की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्हें अनेक मान-सम्मान प्राप्त हुए हैं।

उमा शर्मा: गुरु उमा शर्मा की प्रतिष्ठा कथक नृत्य के क्षेत्र में वरिष्ठ गुरु, कोरियोग्राफर एवं नृत्यांगना के रूप में हैं। 1942 में दिल्ली में जन्मीं उमा ने गुरु हीरालाल एवं गिरिवर दयाल से नृत्य की शिक्षा प्राप्त की। जयपुर घराने की कथक परंपरा के बाद उन्होंने शंभू महाराज एवं बिरजू महराज का भी मार्गदर्शन प्राप्त किया। कथक के प्रति उनका समर्पण महत्व के साथ रेखांकित किया जाता है। देश-विदेश में उमा की प्रतिष्ठा है एवं पद्मश्री एवं पद्मभूषण जैसे सम्मान उन्हें प्राप्त हुए हैं।

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