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'लमही' पत्रिका का अमृतराय जन्मशताब्दी विशेषांक संग्रहणीय है

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डॉ. शुभा श्रीवास्तव
 
रचनाकारों की जन्मशताब्दी हर्ष का विषय है। वर्ष 2020  में फणीश्वरनाथ रेणु, चंद्रकिरण सौनरेक्सा, शांति अग्रवाल, शकुंत माथुर पर जन्मशताब्दी विशेषांक आए हैं परंतु हिंदी साहित्य में कुछ रचनाकार सदैव उपेक्षा का शिकार रहे हैं। इन्हीं रचनाकारों में एक नाम है अमृतराय का। सन 2021 अमृतराय का जन्म शताब्दी वर्ष है। लमही पत्रिका प्रेमचंद और उनकी विरासत से जुड़ी प्रतिबद्धता के लिए सदैव जानी जाती रही है। लमही के प्रमुख विशेषांक श्रृंखला में सारा राय के बाद अमृतराय जन्मशताब्दी विशेषांक अत्यंत महत्वपूर्ण है।  महत्वपूर्ण इन अर्थों में है कि अभी तक किसी भी पत्रिका ने अमृतराय के जन्मशताब्दी की सुध नहीं ली है। विजय राय के कुशल संपादन में 325 पृष्ठों में यह विशेषांक अमृतराय के संपूर्ण व्यत्वि एवं कृतित्व को नए अर्थ में प्रस्तुत करता है। 
 
पत्रिका में अमृतराय के व्यत्वि एवं कृतित्व के सभी आयामों की झलक दिखाई देती है। अमृतराय की कहानी, उपन्यास, संस्मरण, आलोचना, अनुवाद, निबंध, नाटक के साथ ही साथ उनके संपादन कौशल को भी पत्रिका ने अपने कलेवर में बड़ी खूबसूरती से समाहित किया है। अभिमत शीर्षक के तहत विश्वनाथ त्रिपाठी, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, रेखा अवस्थी, चंचल चौहान, विभूति नारायण राय इत्यादि ने अमृतराय के अनेक पहलुओं पर प्रकाश डाला है।
 
अमृतराय पर यह विशेषांक अमृतराय के साहित्य का गहन अध्ययन ही नहीं कराता है, बल्कि अमृतराय के व्यत्वि पर भी पर्याप्त रोशनी डालता है। पत्रिका का सूची क्रम देखकर ही यह अंदाज लगाया जा सकता है कि इस विशेषांक के लिए कड़ी मेहनत की गई है। पत्रिका में अलग-अलग खंड है, जो अमृतराय के विविध पक्षों पर केंद्रित है। चर्चा सबसे पहले 'प्रस्तावन' शीर्षक पर करना मुझे ज्यादा उचित लगा।

'प्रस्तावन' में विष्णु खरे अमृतराय के साहित्य को क्यों पढ़ा जाए इस पर चर्चा करते हैं। जो भी पाठक या आलोचक अमृतराय को प्रेमचंद के पुत्र के रूप में देखने के आदी हैं उनके लिए भी विष्णु खरे पर्याप्त सामग्री प्रस्तुत करते हैं। वह बताते हैं कि प्रेमचंद के कितने कार्य जो अधूरे थे वह अमृतराय ने पूरे किए हैं। 'प्रस्तावन' शीर्षक आलेख मे विष्णु खरे वस्तुतः लमही के उद्देश्य को प्रकट करते हैं साथ ही साथ इस बात पर बल देते हैं कि अमृतराय को पढ़ने की आवश्यकता तब भी थी और आज भी है।
 
धनंजय वर्मा ने अमृतराय की कहानियों पर विशद विवेचन करते हुए अमृत की प्रारंभिक कहानियों को नेचर स्टडी के रूप में रूपायित किया है। धनंजय अमृतराय की कला-दृष्टि को प्रयोजनवाद मानते हैं और कहते हैं कि उनकी कहानियां जिंदगी का सिस्मोग्राफ प्रस्तुत करती हैं। धनंजय वर्मा नई कहानी की प्रवृत्तियों पर दृष्टि डालते हुए  कहानी के फार्म की जकड़न को देखते हैं और कहते हैं कि फार्म की जकड़न से मुक्ति की जिस आंतरिक जरूरत से नई कहानी की शुरुआत होती है उस जमीन की तलाश अमृतराय की कहानियों में दिखाई देती है।
 
शंभु गुप्त का जो अमृतराय की कहानियों पर आधारित आलेख को लघु शोध कहा जा सकता है। पितृसत्ता का छोटा सा उदाहरण लेकर के पूरे स्त्री विमर्श को कहानियों के माध्यम से व्यक्त कर उसकी व्याखया करना शंभु गुप्त के विश्लेद्गाण का वैशिष्ट कहा जा सकता है। कहानियों में शंभु यथार्थ का हर रेशा परत दर परत पाठक के समक्ष उघाड़ देते हैं। शंभु गुप्त का यह कथन पूर्णतः सत्य है कि प्रेमचंद जहां आदर्श और यथार्थ के मध्य संशय के साथ आगे यथार्थ की ओर बढ़ते हैं वही अमृतराय यथार्थ से प्रारंभ करके यथार्थ तक ही पहुंचते हैं। पति पत्नी, कटघरे, एक सांवली लड़की, नक्सलवादी कहानियां इसका जीवित साक्ष्य हैं। अमृतराय की कहानियों का कथ्य कितना विराट और सरल है इस बात को शंभु गुप्त का लेख उद्‌घाटित करता है।

शंभु गुप्त ने लिखा है- 'सांप्रदायिकता, भारत-विभाजन के समय हुए दंगे, हिंदुत्ववाद की गहरी और व्यापक जड़ें, आजादी की वर्गीय वास्तविकता, खोखली योजनाबाज़ी, बंधक और बिकी हुई न्याय-व्यवस्था, युवा पीढ़ी की क्रांतिकारिता और समय की प्रतिक्रांतिकारी शयिां, कांग्रेस की बेईमानियां और दोग़लापन, भारतीय/हिंदू समाज की पितृसत्तावादी अंतःसंरचना; अपने रचना-काल के मद्देनज़र प्रायः हर ज़रूरी और प्रासंगिक मुद्दे पर अमृतराय ने कहानियां लिखीं। 
 
 रमेश अनुपम ने अपने लेख में अनुवाद के कार्य को अमृतराय के महत्वपूर्ण संदर्भ में चयनित किया है। 'नूतन आलोक' जैसी 1947 में प्रकाशित 13 कहानियों के अनुवाद को विशेष रूप से रेखांकित करते हुए वह चीनी, अंग्रेजी, फ्रेंच में महत्वपूर्ण लेखकों के कहानी अनुवाद को महत्वपूर्ण कार्य मानते यह लेख अमृतराय के वृहद भाषाई ज्ञान को उद्‌घाटित करता है। यह कार्य तब हुआ था जब अनुवाद साहित्य की क्या बात करें मूल रचनाएं गुमशुदा थी। अमृतराय का साहित्य मनुष्य विरोधी ताकतों का निषेध करने वाला साहित्य है जिसकी ओर रमेश अनुपम ध्यान आकर्षित करते हैं। अमृतराय का अनुवाद साहित्य भी काफी वृहद है जिस पर अलग से शोध कार्य की आवश्यकता है। अमृतराय के अनुवाद कार्य पर अंबरीश त्रिपाठी, सुधीर सक्सेना, अवनीश राय, नरेंद्र अनिकेत ने अपनी बात रखी है।
 
'अ हाउस डिवाइडेड' की विवेचना करते हुये गजेन्द्र पाठक लिखते हैं कि 'यह किताब हिन्दी और उर्दू के बटे हुए घर की टीस से पैदा हुई अमृतराय की बेचैनी की सर्जनात्मक निष्पत्ति है। जिस धर को सुंदर बनाने में प्रेमचंद जैसे पिता का योगदान हो उस घर के बंटने पर अमृतराय इस किताब के जरिये अपने मानसिक हाहाकार को अभिव्यक्त करते हैं।'
 
संस्मरण किसी भी व्यि के व्यत्वि के उन पहलुओं को उजागर करता है जिससे पाठक रूबरू होना चाहता है। संस्मरण विधा अपने आप में रोचक है इसीलिए सुधा चौहान, हरीश त्रिवेदी, विष्णुकांत शास्त्री, रंजीत साहा, अनिल राय, बटरोही ईश मधु तलवार, निशांत इत्यादि के लेख अमृतराय के उन पहलुओं को उजागर करते हैं जिनसे हिंदी साहित्य का जागरूक पाठक अनजान है। वस्तुतः इन संस्मरण को पढ़कर अमृतराय के साहित्य को अलग नजरिए से देखने के लिए पाठक विवश होता है साथ ही साथ अमृतराय के जीवन के कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं से आत्मीय संवाद भी होता है। विष्णुकांत शास्त्री ने अपने संस्मरण में लिखा है कि 'प्रगतिशील लेखक संघ के कठमुल्लेपन से भी वे खिन्न थे। कम्युनिस्ट पार्टी तो उन्होंने 1 957 में ही छोड़ दी थी, किंतु वे प्रगतिशील लेखक संघ के सदस्य बने रहे। उनकी राय में अब यह उठती दूकान है। उनके अनुसार इसका एक प्रमाण यह भी है कि सन्‌ 1936 में बन्ने भाई इसके सेक्रेटरी थे और 1970 में भी वे ही हैं। अब इसका उपयोग इसके सहारे नेतागिरी करने का, रूस, पूर्वीय यूरोप आदि घूमने का ही रह गया है। अब नए और ईमानदार लोग या तो इसमें आते नहीं या आते भी हैं तो तुरंत इसके कार्यकलाप से विभ्रांत हो अलग हो जाते हैं। यह कथन दुःखद हो सकता है पर सत्य है।' 
 
 हिंदी साहित्य अमृतराय की पहचान 'कलम का सिपाही' के लेखक के रूप में होती है। लमही के इस अंक में 'कलम का सिपाही' पर राजीव रंजन गिरि का लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है जो 'कलम के सिपाही' को अलग नजरिए से देखने की मांग करता है। शम्भुनाथ का मानना है कि 'कलम का सिपाही' अमृतराय की अद्वितीय कृति है, उन्होंने उसे बड़े मन से लिखा है, 'मैं कहना चाहता था कि यह मेरी ही चीज़ है जो मैं लिख रहा हूं, कि यह भी एक उपन्यास ही है जिसका नायक प्रेमचंद नाम का एक आदमी है। फर्क बस इतना ही है कि यह आदमी मेरे दिमाग की उपज नहीं है.......।' (भूमिका)। इस जीवनी की छाप अमृतराय के मन पर हमेशा बची रह जाना स्वाभाविक है।
 
अमृतराय की आलोचना कर्म पर अरुण होता, सियाराम शर्मा, अखिलेश कुमार शंखधर आदि ने महत्वपूर्ण बिंदुओं को उकेरा है। सियाराम शर्मा लिखते हैं कि 'किसी लेखक या आलोचक का अपने युग के ज्वलंत सवालों से टकराना ही उसकी उत्तर-जीविता का सबसे बड़ा प्रमाण है। अपने युग के सवालों और चुनौतियों से बचकर कोई भी लेखक बड़ा नहीं बन सकता। अमृतराय साफ-साफ कहते हैं कि 'फासिज्म पूंजीवाद की सबसे स्पष्ट और खूंखार शक्ल है। देश में वर्ग चेतना पैदा न हो और जनता वास्तविकता से दूर रहे इसलिए वह अपने प्रोपेगैंडा की मशीनरी से जनता के समक्ष झूठ, फरेब और धोखे की हट्टी खड़ी किए रहती है। फासिज्म मनुष्य को परतंत्र बनाने का इच्छुक है। अतः वह सबसे पहले सुंस्कृति पर हमला करता है।'
 
अमृतराय की संपादन योग्यता पर कुमार वीरेंद्र कहते हैं कि 'जो भी हो, अमृतराय ने 'हंस' के दस वर्षों (1942-52) के संपादन-काल में अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के बावजूद उसकी अलग पहचान बनाये रखी, इससे किसी को इनकार न होना चाहिए और न ही यह स्वीकार करने में किसी को कोई कठिनाई होनी चाहिए कि अनेक प्रकार के दबावों के बावजूद उन्होंने साहित्यिक मूल्यों को बनाये रखा। उनकी मूल्यगत प्रतिबद्धताओं के कारण 'हंस' कभी भी आर्थिक रूप से लाभदायी पत्रिका के रूप में स्थापित न हो सकी। 
 
लेकिन जो नयी तब्दीलियां हो रही थीं, नया विकास हो रहा था, सामाजिक संदर्भों में जो परिवर्तन हो रहे थे, आजादी के बाद यथार्थ की जो विविध अवधारणाएं उभर रही थीं, उस पर 'हंस' की निगाह थी और इसके माध्यम से अमृतराय ने सार्थक बहसें चलाईं।
 
राजेंद्र कुमार अपने आप में अलग साहित्य में संयु मोर्चे पर विचार करते हैं सहज काहानी की अवधारणा और कहानी आंदोलनों की सीमाओं का भी उल्लेख करते हैं। अमृतराय की भाषा विचारधारा को भी वह अपने लेख में ले आते हैं और बताते हैं कि उर्दू के संदर्भ में अमृत विरोधी नहीं थे। वह उर्दू को क्षेत्रीय भाषा के रूप में मांग कर रहे थे जबकि साहित्य की राजनीति में कैसे उनके हस्ताक्षर का गलत उपयोग करते उर्दू हिंदी विरोध करने में प्रयोग किया गया इसकी खुलकर के चर्चा करते हैं।
 
मुरली मनोहर प्रसाद सिंह का मानना था कि अमृतराय प्रगतिशील साहित्यिक रुझान वाले साहित्यकार रहे हैं। विष्णु खरे अमृतराय को साम्यवादी आलोचक मानते हैं। अमृत कुछ समय बाद साहित्यिक वामपंथ से अलग हो गए थे। मुरली जी अमृतराय को लेखक से ज्यादा अच्छा पुत्र मानते हैं पर संपादन और लेखन में अमृत का कोई सानी नहीं यह भी वह स्वीकार करते हैं।1936 से 1952 तक की प्रगतिशील आंदोलन को रेखांकित करते हुए अमृतराय की सक्रिय भागीदारी और सामाजिक राजनीतिक आधार पर उनकी विचारधारा और साहित्य की उपेक्षा का उल्लेख करते हैं। उनका मानना है कि 'कलम का सिपाही' जीवनी नहीं हिंदी उर्दू स्वाधीनता आंदोलन का साहित्यिक दस्तावेज है। 
 
रेखा अवस्थी ने अपनी विचारधारा में प्रगतिवाद और समानांतर साहित्य में अमृतराय को प्रगतिशील आंदोलन की जमीन तैयार करने वाला प्रमुख कर्ता माना है। रेखा जी का मानना है कि 1957 में साहित्यकार सम्मेलन जिसके मुखय आयोजक अमृतराय थे के बाद ही हिंदी साहित्य में नई कविता, नई कहानी की पहचान शुरू होती है इसके लिए कहीं ना कहीं अमृतराय स्वयं सक्रिय थे। अमृतराय के कथ्य और शिल्प में व्यंग्यात्मक शैली ने उनकी वैचारिक जीवन दृष्टि को पूरी तरह से व्यक्त करने में कलात्मक योगदान किया है और हिन्दी भाषा को प्रतिरोध की व्यंजना से समृद्ध किया है।
 
अमृतराय के कहानी संग्रह 'लाल धरती' की भूमिका में कृश्नचंदर ने बड़ी बेबाकी से लिखा है कि 'अमृतराय महज कहानी लिखने के लिए कहानी नहीं लिखते बल्कि कहानी लिखते वक़्त उनके सामने जिन्दगी और समाज के और चरित्र और वर्गों के मसले रहते हैं, उनकी टक्कर रहती है और उस टक्कर से कुछ निष्कर्ष निकलता है। जिन्दगी और समाज के बारे में उनका एक जीवन दर्शन है जिसे वह अपनी कहानियों में लागू करते हैं।'
 
नाटककार राजेश कुमार लिखते हैं कि अमृतराय ने नाटकों में कोई समझौता नहीं किया। सत्ता से सीधा टकराने का रास्ता चुना। उल्लेखनीय है कि अमृतराय द्वारा अनूदित बर्टोल्ट ब्रेख़त और शेक्सपीयर के नाटक आज भी रंगकर्मियों की पहली पसंद हैं। अमृतराय का नाट्‌य संग्रह 'आज अभी' के तीनों नाटक बिल्कुल अलग मिजाज और अंदाज के हैं।
 
कभी-कभी यह सोच कर के बेहद आश्चर्य होता है कि अमृतराय ने इतनी भूमिकाओं को कैसे अदा किया होगा एक अच्छा पुत्र, एक अच्छा प्रकाशक, एक अच्छा संपादक, एक अच्छा आलोचक। 10 वर्षों तक 'हंस' का संपादन और 'नई कहानियां' पत्रिका का 5 वर्ष तक संपादन अपने आप में शोध की मांग करता है परंतु इस पर अब तक कोई कार्य नहीं हुआ है। 
 
'लमही' ने हिन्दी समाज को उपहार के रूप में अमृतराय विशेषांक भेंट किया है। यह एक संग्रहणीय विशेषांक है और अमृतराय के पाठकों, अध्येताओं और शोधार्थियों के लिए बहुत उपयोगी संदर्भ सामग्री से भरपूर एक जरूरी दस्तावेज़ है।
 
डॉ. शुभा श्रीवास्तव
प्रवा, राजकीय क्वींस कॉलेज वाराणसी

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