पद्मश्री सम्‍मान: सम्‍मान का असम्‍मान, मना करने का नैतिक साहस और पुरस्‍कारों का राजनीतिकरण

जनता दल यूनाइटेड के नेता शरद यादव ने कुछ साल पहले पद्मश्री पुरस्‍कार के बारे में कहा था कि-
‘यह बेईमान लोगों को दिया जाता है’।


कुछ साल पहले स्‍क्रिप्‍ट राइटर सलीम खान को जब पद्मश्री देने की घोषणा की गई थी तो उन्‍होंने इसे लेने से इनकार कर दिया था। उनका तर्क था कि उनसे पहले उनके कई जूनियर्स को यह पुरस्‍कार मिल चुका है।

साल 2014 में योग गुरु बाबा रामदेव ने पुरस्‍कारों की घोषणा से पहले यह कहकर मना कर दिया था कि वे तो सन्‍यासी हैं और देश के लिए वे जो कर रहे हैं वो तो उनका फर्ज है। यह सम्‍मान तो किसी योग्‍य नागरिक को दिया जाना चाहिए। हालांकि कहा तो यह भी जाता है कि बाबा रामदेव को यह सम्‍मान देने से विवाद हो सकता है, क्‍योंकि उनके ऊपर कुछ मामलों की जांच चल रही थी।

वजह कुछ भी हो, लेकिन सलीम खान और बाबा राम देव ने अपने अपने तर्कों के साथ इस सम्‍मान को लेने से मना कर दिया था। क्‍या यह साहस अदनान सामी और सैफ अली खान में नहीं है कि वे यह कह सकें या पूछ सकें कि आखिर उन्‍हें किस वजह से और क्‍यों यह सम्‍मान दिया जा रहा है?

दरअसल, हाल ही में गणतंत्र दिवस पर पद्मश्री पुरस्‍कारों की घोषणा हुई है। इस घोषणा के तुरंत बाद इस पर सवाल और विवाद भी शुरू हो गया है।

पार्श्‍वगायक अदनाम सामी को पद्मश्री देने को लेकर लोगों ने सवाल उठाए हैं। विवाद यह है कि पाकिस्‍तान मूल के अदनान ने कुछ ही साल पहले भारत की नागरिकता ली है, उन्‍होंने ऐसा क्‍या किया है, और फिर वे उस पाकिस्‍तानी पिता की संतान हैं, जिसने भारत के खिलाफ युद्ध में हिस्‍सा लिया था। इधर सैफ अली खान को लेकर भी सवाल है कि आखिर उन्‍होंने ऐसा क्‍या किया कि उन्‍हें यह सम्‍मान दिया जाए।

अदनान को तो ट्विटर पर ट्रोल का सामना भी करना पड़ रहा है।

क्‍या पुरस्‍कार पाने वालों को नहीं लगता कि वे इसके हकदार है या नहीं? या इसके पीछे यह धारणा काम कर रही है कि मिल रहा है तो ले लो। हालांकि ऐसा होना किसी भी स्‍तर पर संभव नहीं है, क्‍योंकि जिन्‍हें यह सम्‍मान दिया जाता है, वे इसके लिए कई सालों तक लगे रहे हैं।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि पद्मश्री पुरस्‍कारों के नामों के चयन में स्‍क्रिनिंग कमेटी अपनी चयन प्रक्रिया में स्‍वतंत्र है या वो किसी तरह के दबाव में काम करती है? या क्‍या ऐसे सम्‍मानजनक पुरस्‍कारों का अब राजनीतिकरण होने लगा है?

हालांकि इतिहास गवाह है कि पुरस्कारों के चयन में लॉबिंग, भेदभाव, अनुशंसा, लापरवाही और अपारदर्शिता के कारण यह हमेशा विवादों में रहे हैं। लेकिन अब इसका खुलेतौर पर राजनीतिकरण होना बड़ी चिंता का विषय है।

गृह मंत्रालय में सूचना अधिकारी रह चुके कुलदीप नैयर ने एक बार कहा था कि इन सम्‍मानों की चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना असंभव सा काम है, यह मजाक बन चुके हैं और इसलिए इन पुरस्‍कारों को खत्‍म कर दिया जाना चाहिए।

अगर कुछ साल पहले शरद यादव ने यह कहा था कि इस तरह के पुरस्‍कार बेईमान लोगों को दिए जाते हैं तो शायद उनकी बात पूरी तरह से गलत नहीं थी।

यह वो समय है जब सम्‍मान की गरीमा को बनाए रखने के बारे में सोचना होगा, पुरस्‍कार सूची में नाम आने पर पुरस्‍कृत किए जाने वालों को नैतिक साहस के साथ यह सवाल पूछना होगा कि उन्‍हें क्‍यों दिया जा रहा है, और सबसे महत्‍वपूर्ण चयन समिति को तो राजनीति से ऊपर उठकर खुद को इससे आजाद करना होगा।

(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। इसमें शामिल तथ्य तथा विचार/विश्लेषण 'वेबदुनिया' के नहीं हैं और 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)

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