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हम सबमें अपना शहर धड़कता है

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रवींद्र व्यास

कवि कुमार अंबुज का गद्यांश और प्रेरित कलाकृति
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Ravindra Vyas
WD
अपना गाँव कस्बा या शहर छोड़ देना, उसे अपने लिए एक स्थायी इतिहास बना देना सदैव ही सबसे मुश्किल काम है। और इसका कोई बहुत बड़ा, व्यावहारिक बुद्धि से लबरेज, लाभ-हानिवाला कारण बताना लगभग नामुमकिन है। याद करें, `नसीम´ फिल्म में बूढ़े दादाजी, इस सवाल पर कि हम भी पाकिस्तान क्यों नहीं चले गए, अपनी पोती से कहते हैं कि `तुम्हारी दादी को यह सामने लगा नीम का पेड बहुत पसंद था, इसलिए।´

अब इस कारण को समझना बेहद आसान भी है और अत्यंत मुश्किल भी। इन्हीं वजहों से साहित्य में विस्थापन को लेकर, अपनी जगह-जमीन को लेकर महान रचनाएँ संभव होती रही हैं। दरअसल, शहर और आप, दोनों साथ-साथ विकसित होते हैं। पल्लवित होते हैं और एक साथ टूटते-फूटते हैं। कभी शहर में फूल खिलते हैं, नये पत्ते आते हैं तो आपके भीतर भी वे सब दर्ज होते हैं और जब आपके भीतर फुलवारी खिलती है तो आप देखते हैं कि शहर में भी जगह-जगह गुलमोहर फूल गया है।

जब भी आप उदास होते हैं, अवसाद या दुख में होते हैं तो शहर अपनी किसी पुलिया के साथ, किसी पुराने पेड़ की छाया और उसके विशाल तने के साथ, अपने मैदान में ढलती शाम के आत्मीय अंधेरे के साथ आपके लिए उपस्थित हो जाता है।

जैसे आप शहर के हर उस कोने-किनारे को जानते हैं, उन जलप्रपातों, कंदराओं और आँचल को जानते हैं जहाँ जाकर एकदम किलकारी भर सकते हैं या सुबक सकते हैं। और जानते हैं कि यह शहर आपकी किसी मूर्खता, भावुकता और तकलीफ को इस तरह जगजाहिर नहीं होने देगा कि आपको शर्मिंदगी हो। यह अपना शहर है, यह आपको उबार लेगा।

और मौका आने पर आज भी अपने कंधे पर बैठा लेगा। शहर की ठोकरों के निशान आपके माथे और आत्मा पर कुछ कम नहीं हैं लेकिन कुछ रसायन हैं जो तब ही बनते हैं जब आप अपने शहर में होते हैं। भीतर कुछ धातुएँ हैं, घंटियाँ हैं, जिनका संगीत शहर में होने से ही फूटता है। जब आप अपने शहर में नहीं हैं तब भी एक तरह का संगीत, एक सिम्फनी बजती रहती है, लेकिन उसका राग कुछ अलग होता है।

आप जानते हैं कि काफी हद तक ये सब रूमानियत और भावुकता से भरी बातें हैं। यथार्थ का धरातल रोजी-रोटी है। कस्बों और छोटे शहरों का अनियोजित विकास, टूटी सड़कें, फूटी नालियाँ, तंग गलियाँ, धूल, गंदगी, जाहिली-काहिली हमारे सामने वास्तविकता के बड़े हिस्से की तरह प्रकट है।

लेकिन यह भी सच्चाई है कि हर आदमी को जैसे अपना एक शरीर मिलता है, वैसे ही उसे अपना एक शहर मिलता है। जीवन में सिर्फ एक बार। लेकिन चाहते हुए भी आप हमेशा अपने शरीर में वास नहीं कर सकते। दूसरी देहों में भी आपको रहना पड़ता है। यह कायांतरण जीवन की विडंबना है, लेकिन है।

इस कायांतरण में आपको तिलचट्टे की देह मिल सकती है या मुमकिन है कि आपको किसी सुंदर पक्षी या चीते की देह मिल जाए। लेकिन फिर आप हमेशा ही अपने शरीर की खोज करते हैं कि आपका पुनर्वास हो सके। आपकी हर ऊँची उड़ान, हर अकल्पनीय छलाँग या वेदनापूर्वक घिसटने की नियति, त्रासदी या उल्लास जैसे अपनी उस देह को फिर से पा लेने की ही कोई कोशिश है।

लेकिन यह भी सच्चाई है कि हर आदमी को जैसे अपना एक शरीर मिलता है, वैसे ही उसे अपना एक शहर मिलता है। जीवन में सिर्फ एक बार। लेकिन चाहते हुए भी आप हमेशा अपने शरीर में वास नहीं कर सकते। दूसरी देहों में भी आपको रहना पड़ता है।
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हर दूसरा शहर, हर दूसरा शरीर जैसे कोई अस्थायी राहत-शिविर है। सराय है। तम्बू है। दूसरे शरीर में रहते हुए, चाहे वह कितना ही सुंदर, सुगंधित, सामर्थ्यवान क्यों न हो, एक परायेपन, अचकचाहट और प्रवासी होने का बोध बना रहता है। जैसे आप निष्कासन पर हैं। और अपनी देह कितनी ही कुरूप हो, धूल-धक्कड़ से भरी हो, चुंबनों या घावों से लबरेज हो और उसमें कितनी ही मुश्किलें बन गई हों मगर आपको लगता है कि यहाँ आप अजनबी नहीं हैं।

आश्वस्त है कि आप इस शरीर के सारे रास्ते जान सकते हैं। सारी गलियाँ, धमनियाँ, सारे चौराहे, घाटियाँ, खाइयाँ और गूमड़। उन स्पंदनों, संवेगों और तरंगों के साथ सहज रह सकते हैं जो आपकी देह में से उठती हैं। चूँकि शरीर की तरह, शहर-गाँव भी एक ही बार आपको प्राप्त होता है इसलिए छूट गए शहर से आपकी मुक्ति संभव नहीं। वह आपका था, आपका है। आप उससे दूर हैं लेकिन वह आपका है। वह नष्ट हो रहा है तब भी और उठान पर है तब भी। दोनों स्थितियों में वह आपको व्यग्र बनाता है।

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