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रंगमंच का पर्याय हबीब तनवीर

अपने नाटकों में महकते रहेंगे हबीब

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स्मृति आदित्य

अभिव्यक्ति के तमाम शिखर को स्पर्श करने वाला वह सच्चा इंसान खामोश हो गया लेकिन हबीब के नाटकों से उनके विचारों और तेवरों की खुशबू कला जगत को सराबोर करती रहेगी। हबीब जैसे इंसान भला कहाँ मरा करते हैं उन्हें तो दिलों में जिन्दा रहने का हुनर आता था।      
रंगमंच का पर्याय हबीब तनवीर नहीं रहे। यह खबर थिएटर जगत को स्तब्ध करने के साथ ही उनकी रचनाधर्मिता के प्रति अपनी आदरांजलि अर्पित करने वाली है। एक हरफनमौला, जमीन से जुड़ा, सीधा सरल इंसान। अपनी ही धुन में इतना मगन कि उनसे कहीं भी, कभी भी, किसी भी विषय पर बात करना बेहद सरल था। मगर यह भी सच है कि उनसे बात करने की पहल करना बड़ा मुश्किल भी था।

पद्म श्री, पद्म भूषण, राज्यसभा सदस्य के अतिरिक्त अनगिनत रंगमंचीय उपलब्धियाँ उनके खाते में दर्ज रही, ना जाने कितने अलंकरण उनके सम्मान में सजे रहें मगर वे इतने निर्लिप्त जैसे यह सब उन्होंने नहीं बल्कि किसी और ने हासिल किया हो।

कला की शायद ही कोई ऐसी विधा रही है जिसकी किरण हबीब को छू कर ना गुजरी हो और अभिव्यक्ति का शायद ही कोई ऐसा आयाम हो जो हबीब को छूने को ना मचला हो।

उनके प्रमुख नाटकों में शतरंज के मोहरे (1954), लाला शोहरत राय (1954), मिट्टी की गाड़ी (1958)गाँव का नाम ससुराल हमार नाम दामाद (1973), चरण दास चोर (1975), हिरमा की अमर कहानी उत्तर रामचरित्र (1977), पोंगा पंडित, जिस लौहार नहीं देख्या (1990), कामदेव का अपना बसंत ऋतु का सपना (1993), जहरीली हवा (2002), राज रक्त (2006) आदि गिनाए जा सकते हैं लेकिन चरणदास चोर की अपार लोकप्रियता ने हबीब की कला जगत में एक खास जगह बनाई। 'जहरीली हवा' नाटक उन्होंने भोपाल गैस त्रासदी पर लिखा था।

एक सितंबर 1923 को रायपुर में जन्में हबीब तनवीर की शिक्षा नागपुर और अलीगढ़ में हुई। 1945 में वे मुंबई आ गए। यहाँ आल इंडिया रेडियो से जुड़ कर उनके तेवर और प्रखर हुए।। यहीं उन्होंने हिंदुस्तानी थिएटर में रंगकर्म किया और बच्चों के लिए नाटक किए। जब हबीब तनवीर इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) और प्रगतिशील लेखक संघ (पीडब्ल्यूए) से जुड़े तो, वे अपने समाज और वंचितों के प्रति सजग हुए। इन दोनों संस्थाओं से जुड़ने से उनकी सोच और कला दोनों में सामाजिक स्तर पर एक नई चिंगारी ने जन्म लिया। हबीअभिनदुनियमेअपनविशिष्छाछोड़ी।

भारत-भवन (भोपाल) में हबीब से मुलाकात इतनी सहज होती थी कि सहसा विश्वास नहीं होता कि यह अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार है जो बिना किसी गुमान के शांत भाव से धूप सेंक रहा है। लगातार चलने वाला चिंतन उनके चेहरे पर साफ नजर आता था मगर आरंभिक डर निकल जाने के बाद हबीब जी को सुनना अतीत की महकती क्यारियों से गुजरने जैसा था।

अभिव्यक्ति के तमाम शिखर को स्पर्श करने वाला वह सच्चा इंसान खामोश हो गया लेकिन हबीब के नाटकों में उनके विचारों और तेवरों की खुशबू कला जगत को सराबोर करती रहेगी। हबीब जैसे इंसान भला कहाँ मरा करते हैं उन्हें तो दिलों में जिन्दा रहने का हुनर आता था।

एक स्थानीय अखबार के लिए साक्षात्कार लेने के बाद जब ऑटोग्राफ माँगा था तो हबीब मुस्करा दिए थे। आज भी याद है वह शेर जो बरबस हबीब के मुँह से झरा था -

हम हस्ताक्षर नह‍ीं किया करते
बड़ी कारीगरी से खुद को दिलों पर टाँक दिया करते हैं।

और सचमुच हबीब हमारे दिलों में हमेशा टँके रहेंगे।

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