हाँ, मैं पुराना नोट हूँ, कहिये! मेरा क्या कुसूर है।
जो कल तक थे मेरे मुरीद, आज मुझसे दूर हैं।।
कल तक तो मैं था "गाँधी छाप", आज तो बस कागज़ हूँ।
कल तक था जिनका मैं होनहार
आज उनकी ही संतान नाज़ायज़ हूँ।।
कल तक था मैं दस तालों में, आज गंगाजल में हूँ।
कचरा घर में, संडासों में या अग्नि की झल में हूँ।।
देखो! ये रिश्वती, काले धनपति कैसे तेवर बदलते हैं।
उजालों के दुश्मन हैं सब, बस अंधेरों में मचलते हैं।।
अरसे से बंद रहा मैं इनकी काल कोठरियों में।
कोई एक मुक्तिदाता शायद उभरा है सदियों में।
तिस पर भी गाली पर उतरे हैं निहित स्वार्थों के पंडे।
और चुनावोन्मुख वे दल जिनके नाकारा हुए झंडे-डंडे।।
आतंकी बंदूकों से भी छिन गई गोलियाँ सब।
हर दुआ में गाली की बौछारें करने लगा पाकी मजहब।।
मित्रों देशहित की रक्षा में मैं तो असमय मर जाऊंगा।
पर देश की अर्थव्यवस्था की गंदगी साफ कर जाऊंगा।।
About Writer
डॉ. रामकृष्ण सिंगी
डॉ. रामकृष्ण सिंगी ने मध्यप्रदेश के शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालयों में 40 वर्षों तक अध्यापन कार्य किया तथा 25 वर्षों तक वे स्नातकोत्तर वाणिज्य विभागाध्यक्ष व उप प्राचार्य रहे। महू में डॉ. सिंगी का निवास 1194 भगतसिंह मार्ग पर है। डॉ. सिंगी देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इंदौर (मप्र) के वाणिज्य संकाय....
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