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सघन वटवृक्ष की मीठी छांव है पिता

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पिता
प्रीति सोनी 
 
पिता, 
किसी वटवृक्ष की, 
घनी छाँव का वह एहसास
जिसमें रहकर दुनिया भर की तपन भी 
राहत लगती है । 


प्रेम का वह समंदर जो दिखता नहीं, 
लेकिन उसकी आती जाती लहरें, 
सदैव प्रेम का एहसास कराकर ही लौटती हैं।  
इस समुंदर में भरा होता है, एक खजाना, 
खाली हाथ उस दर से 
कभी कोई लौटता नहीं। 

यादों को जब पलकें धीरे से खोलती है, 
तो यादें मीठे से स्वर में बोलती हैं।   
बताती है कई किस्से कहानियां, 
अतीत के उन पलों के, 
जब आप किसी के आंखों के तारे हुआ करते थे.. 
बस याद आता है वह एक शख्स, 
हम जिसकी तस्वीर हुआ करते थे। 

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वो दिन आज भी याद है,  
जब मां की जगह पिता ने, 
लोरी गाकर सुलाया था।  
वो सुबह आज भी याद है,  
जब पिता ने स्कूल के लिए जगाया था। 
वो दिन नहीं भूले कभी, 
जब हर रास्ता पिता ने ही बताया । 
हर परेशानी का हल,  
हमेशा वहीं पर पाया।  
 
देव है वह धरती पर , 
दीदार भी आसान है। 
दुआओं में ही उसकी 
अपना सब संसार है । ।  

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