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अंबर के तारों से पूछो

डॉ. रमाकांत शर्मा

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बुझे
WDWD
मेरे मन की हालत क्या बतलाऊँ मैं
पतझड़ के फूलों से पूछो बतला देंगे
कैसे जमती धूल यहाँ सच की परतों पर
मंदिर के खंडहर से पूछो बतला देंगे।

विश्वासों पर अंकुर है नफ़रत के फूटे
कलियों ने मकरंद बिखेरा चिन्गारी का
कैसे बीते पल, घड़ियाँ ये बीतीं कैसे
अंबर के तारों से पूछो बतला देंगे

प्रीत बँधी बंधन में फिर भी है अकुलाती
जग में केवल रहा स्वार्थ से लिपटा नाता
कब रोती हैं किरणें कब रोता है चंदा
दीप-पतंगों से पूछो वे बतला देंगे।

मन की गाँठें खुली नहीं कि लगी उलझने
अपने सपने हुए पराए देख दीवाने
मतलब से पलती प्रीति दुनिया में कैसे
उपवन के शूलों से पूछो बतला देंगे।

ठोस डूब जाते हैं तिनके तैरा करते
साथी युग का सत्य रहा तुझसे अनजाना
छिछलों का अस्तित्व यहाँ बनता है कैसे
बुझे-बुझे चेहरों से पूछो बतला देंगे।

साभार : संबोधन

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