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अधूरी इबारत

रश्मि रमानी

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ND
प्रेम
खुबने लगा है मुलायम अंकुर की तरह
भीतर की सतह पर
और सिहरने लगी है लड़की
अपनी ही धड़कनों की आवाज से।
बार-बार सँवारती थी वह उस लट को जिसमें समाया था
आत्मीय स्पर्श जादू भरा।

अपने भीतर उठती गंध को महसूसते
बेसुध लम्हों में देख रही थी
तन पर झरते हरसिंगार को।

ऋतुचक्र के दिनों में टूटती कसमसाती देह
जब हो जाती थी हल्की
मल की तरह
तो, मन में उठती थी चाहत
बसंत के गलियारे से गुजरने की।

प्रेम में बदल गई थी लड़की
एक अधूरी इबारत में
जिसे पूरा करने के लिए चाहिए था
सिर्फ एक लफ्ज,
एक लम्हा,
एक स्पर्श।

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