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अनुभूति का गीत

राजीव सारस्वत

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साहित्य
NDND
जब भी छुआ है गुलाबों की पँखुड़ियों को

तुम्हारे कपोलों का धोखा हुआ है

जब भी हिली हैं खिली कलियाँ हवा से

तुम्हारी ही खुशबू को अनुभव किया है

जब भी छुआ है गुलाबों की पँखुड़ियों को ...

गुलाब के काँटों-सी चुभने लगी ज

तुम्हारे विरह की मन मेचुभन

तभी झुकती डाली से सूर्यमुखी न

तुम्हारी तरह मेरा काँधा छुहै

जब भी छुआ है गुलाबों की पँखुड़ियों को ...

तुम्हारी ही यादों में खोया हूजब भ

फूलों में खोए भ्रमर की तर

तो शतदल कमल के हरे चिकने पत्तों प

अचानक कहीं कोई मोती चुआ है

जब भी छुआ है गुलाबों की पँखुड़ियों को ।

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