जब भी छुआ है गुलाबों की पँखुड़ियों को
तुम्हारे कपोलों का धोखा हुआ है
जब भी हिली हैं खिली कलियाँ हवा से
तुम्हारी ही खुशबू को अनुभव किया है
जब भी छुआ है गुलाबों की पँखुड़ियों को ...
गुलाब के काँटों-सी चुभने लगी जब
तुम्हारे विरह की मन में चुभन
तभी झुकती डाली से सूर्यमुखी ने
तुम्हारी तरह मेरा काँधा छुआ है
जब भी छुआ है गुलाबों की पँखुड़ियों को ...
तुम्हारी ही यादों में खोया हूँ जब भी
फूलों में खोए भ्रमर की तरह
तो शतदल कमल के हरे चिकने पत्तों पर
अचानक कहीं कोई मोती चुआ है
जब भी छुआ है गुलाबों की पँखुड़ियों को ।