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राजकुमार कुम्भज
वह सुबह कभी होगी तो देखूँगा
अभी तो घने अंधकार में ढूँढ रहा हूँ सघनता से
अपने हिस्से की सुई।
वह सुबह कभी होगी तो देखूँगा
अभी तो घने अंधकार में ढूँढ रहा हूँ सघनता से
सबके हिस्से की पीड़ा।
वह सुबह कभी होगी तो देखूँगा
अभी तो घने अंधकार में ढूँढ रहा हूँ सघनता से
अपने हिस्से की लड़ाई
और बसंत भी।
वह सुबह कभी होगी तो देखूँगा
अभी तो घने अंधकार में ढूँढ रहा हूँ सघनता से
अपने हिस्से की हिम्मत।
वह सुबह कभी होगी तो देखूँगा
अभी तो घने अंधकार में ढूँढ रहा हूँ सघनता से
अपने हिस्से की रोशनी।