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आँगन में जैसे खिली धूप हो

हेमलता गोड़बोले'सरोजिनी'

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कविता
ND
किस तरह उसको घर हम कहें
जिसमें हो कोई खिड़की नहीं
सूने आँगन में कोई कैसे रहे
खिलखिलाती जहाँ कोई लड़की नहीं
मैं तो भोली थी और मैं तो अंजान थी
एक दिन एक मुझको नियामत मिली
एक नन्हीं कली मेरे घर में मिली
फूलों के पराग से थी वो सनी
स्वर्ग की अप्सरा सी वो लगे
मुस्कुराए तो जैसे कि हो रोशनी
वो हँसे तो अमावस में हो चाँदनी
मेरा खुद का तो जैसे नया रूप है
मेरे आँगन में जैसे खिली धूप हो
जरा-जरा सी बात पर ठुनकती है वो
पिता के लिए हिरण का छौना है वो
भाई का प्यारा खिलौना है वो
पड़ोसियों को प्यार की तस्वीर वो लगे
मेरे लिए वो ख्वाब की ताबर वो लगे
दुनिया भर की बातों का खजाना है वो
सवालों जवाबों का कारखाना है वो
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ND
वो नाजुक कली है मेरे बाग की
चलती, फिरती निशानी है अनुराग की
उसे इस तरह से बनाना मुझे
चालाक दुनिया से जो लड़ सके
कितनी मुश्किल आए मगर
तरक्की और घर का उजाला बने
रूप नारी का सबसे निराला बने
सब पूछे भला किसकी लड़की है ये
इतरा कर, शरमा कर, मुस्कुराकर कहूँ
मेरी लड़की है ये।

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