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आग घर-घर जल रही है

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आग घर-घर जल रही
श्रीकांत प्रसाद सिं
WDWD

कहाँ आ पहुँचे,
बटोही !
साँप का तो यह शहर है,

कहाँ खोजोगे
बसेरा ?
ब्याल विषघर हर डगर है !

नाग-कन्या
सुंदरी है,
चंचला ! मन-मोहनी है !

प्रणय की
प्रयासी, वियोगिनी
मानिनी ! उन्मादिनी है !

मधु प्रणय की
रागिनी क्या
बीन पर तुम बजा सकते ?

विरह की पीड़ा
सुरों में
ताल-लय पर सजा सकते ?
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WDWD

शरण-स्थल
मिल सकेगा,
छरहरी बावली है !

नवयौवना यह
द्रौपदी-सी श्यामली है!

नाग-कन्या के इशारे
राज-सत्ता चल रही है,

नाग-राजा
है विलासी !
आग घर-घर जल रही है।

साभार : अक्षरा

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