आलिंगन हवाओं का। और ऐसा भी कि गुजर ही न सके हवा बीच उसके! और वह भी कि हल्का हो स्पर्श हो बस सरसराहट एक वस्त्रों की कंधे पर, पीठ पर, हल्की-सी एक थाप कुछ है आलिंगन में जो यों दिखता नहीं अपने भी पार चला जाता है लेकिन अदृश्य कुछ, सौम्य मधुर आता उतर भीतर, दो के मिल जाने पर वापस आ किन्हीं दो दिशाओं से!