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आलिंगन हवाओं का

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आलिंगन साहित्य
प्रयाग शुक्ल
ND
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आलिंगन हवाओं का।
और ऐसा भी कि गुजर ही
न सके हवा बीच उसके!
और वह भी कि
हल्का हो स्पर्श
हो बस सरसराहट एक
वस्त्रों की
कंधे पर, पीठ पर,
हल्की-सी एक थाप
कुछ है आलिंगन में
जो यों दिखता नहीं
अपने भी पार चला जाता है
लेकिन अदृश्य कुछ, सौम्य मधुर
आता उतर भीतर,
दो के मिल जाने पर
वापस आ किन्हीं
दो दिशाओं से!

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