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shiv chalisa

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उसे देखता था कोई

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हमें फॉलो करें साहित्य कविता नया ज्ञानोदय
- हेमंत कुकरेती

उसे भी पता चले
कोई उसे देख रहा है कहकर
मैंने उजाला ओझल करना चाहा
उसकी त्वचा वैसे ही चमक रही थी
नया पानी जैसे दिसंबर का

मुझे डर था
कहीं मैं उसे मार न दूँ

पहाड़ पर साँप से डर नहीं लगता
साथ ही रहते हैं बनैले पशु भी
पहाड़ जब करते हैं अकेला
गुमा देते हैं
अपनी दरारों में
जाने किस बात पर उसका हँसना ठहरा
हर बार ठीक नहीं लगता
मुस्कराना भी कई बार लगता है ज़हर

कल जब मैं नहीं रहूँगा
यह रात रहेगी
आवाज रहेगी गूँजती उन चट्‍टानों में
जो अपने पत्थरों में टूटकर
पानी में मिट्‍टी हो गई

उसे भी पता चलेगा
कोई उसे देखता था।

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