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एक और नया गीत

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साहित्य
शलभ श्रीराम सिंह
NDND

चंपा ने

जब पलाश को देखा

थोड़ी-सी और खिल गई!

एक की हथेली ने पोंछ लिया

दूजे के माथे का पसीना

सहसा आसान हो गया जीना

बिन खोजे राह मिल गई!

चंपा ने

जब पलाश को देखा

थोड़ी-सी और खिल गई!

ईहा की बँधी हुई मुट्ठियाँ

जीवन के उठे हुए पाँव

देख - फ़र्क़ अपना खो बैठे हैं

जाड़ा-बरसात- धूप-छाँव!

कुंठा की नींव हिल गई!

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चंपा ने

जब पलाश को देखा

थोड़ी-सी और खिल गई!

साभार : वागर्थ

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