एक दिन तो जिऊं
अपने मन का
रात देखे सपने के साथ
सुबह मुस्कराकर जागूं
और दिन के किसी खाली कोने में
खुली खिड़की के पार
उड़ जाऊं
तुम्हारे खुशनुमा खयाल के साथ
निकाल लाऊं
बक्से के किसी कोने में छिपी
कोई नाजुक-सी स्मृति
और छू लूं तुम्हारे
नर्म अहसास को
बदल कर
बालों में कढ़ी मांग को
आइने में देख लूं जरा
अपना चेहरा
और मुस्करा लूं
बिस्तर में औंधे लेटकर
टांगों को हिलाते हुए
घड़ी की सुइयों से बेखबर
पढूं कोई कहानी
एक दिन तो जिऊं
अपने मन का।