ऐ मौत, तब सन् 2001 में भले छीन लीं थी तूने हजारों जिंदगियाँ!
बना दिया था लाखों को बेघर और अपाहिज पलों में तबाह कर दीं थी बसी-बसाई बस्तियाँ। डकार गई थी तू गणतंत्र रैलियाँ।
वहाँ कच्छ में तब हर दीवार बिसुर रही थी, खंबा-खंबा सिसक रहा था बारसाखें कराँज रही थी। लेकिन उतने तांडव के बाद भी एक दूधमुँहें बच्चे के मासूम मुखड़े से तू हार गई थी।
बच्चा, जो कुछ नहीं जानता क्या होता है भूकंप? बच्चा, जो माँ के स्तनों से दूध पीता रहा, फिर रक्त पीता रहा जीता रहा, जिंदा रहा और जीत गया था
ऐ मौत, तब तू हार गई थी।
ऐ मौत, सन 2004 में भी झपट ली थी तूने लाखों से अधिक जिंदगियाँ कर दिया था करोड़ों को आवासहीन और शिथिलांग क्षण में मटियामेट कर दिए थे जमे-जमाए जीवंत किनारे लील ली थी तूने मछुआरों सहित नौकाएँ। वहाँ साउथ एशिया में तब 'सुनामी' नाम रूह कँपा रहा था।
बालू का कण-कण सुबक रहा था पॉम नारियल के पेड़ हिचकियाँ भर रहे थे।
लेकिन उतने प्रलयंकारी रूप के बाद भी एक नन्हे छौने बच्चे के सलोने मुखड़े से तू हार गई थी। बच्चा जो बिलकुल नहीं जानता क्या होता है भूकंप? क्या होती है सुनामी?
बच्चा जो लकड़ी के लट्ठे पर निर्विघ्न सोता रहा। फिर भयंकर हिचकोले खाता रहा जीता रहा, जिंदा रहा और जीत गया था।
ऐ मौत, तब भी तू हार गई थी
अब सन् 2011 जापान में भी देखना ऐ मौत अंतत: तू ही हारेगी..!
( भूकंप में मौत के तांडव के बीच भी जीवन के मुस्कुराने की खबर मिलने पर लिखी कविता )