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ओ मनचीते ढाई आखर

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अश्वघोष
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ओ मनचीते ढाई आखर
कहाँ खो गए राह दिखाकर?


तुम्हें खोजते जीवन बीता
फिर भी मैं रीते का रीता ।


क्या पाओगे मुझे सताकर
ओ मनचीते ढाई आखर ।


अभी यहाँ थे, यहाँ नहीं हो
जहाँ-जहाँ थे वहाँ नहीं हो ।


कहाँ सो गए मुझे जगाकर
ओ मनचीते ढाई आखर ।


तुम राई हो, तुम हो पर्वत
तुम आखेटक, तुम ही आहत ।
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तुम ही बूँद हो, तुम ही सागर
ओ मनचीते ढाई आखर
कहाँ खो गए राह दिखाकर?


साभार : अक्षरा

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