हर सुबह ख्वाबों के कितने मोती मन के कोने में छुपा देती हूँ फिर जाने कहाँ से सामने आता है वो ईद की सुबह सा चाँद से उजले लिबास में फरिश्तों की तरह उलझनों से मुझको घिरा पाता है जब भी फिर मुस्करा कर कहता है मेरा और तुम्हारा मजहब एक है ये जमीं एक है आसमाँ एक है सुनो अल्लाह एक है तुम्हें क्यों नहीं यकीं मेरे हाथ की आधी रेखा, तुम्हारे हाथों से मिलेगी तब एक चाँद खिलेगा और हमारी ईद होगी ना कोई मजहब उसका ना हमारे चाँद की जात होगी कुरान की आयतों सा हर लफ्ज़ उसका फिजा में घुल जाता है मैं अपनी बंद मुट्ठी खोलकर बनाना चाहती हूँ एक चाँद पर हकीकत की रोशनी में उसका हाथ छुट जाता है और हमारे चाँद का एक अधूरा हिस्सा मेरे आँसुओं से भीग जाता है।