* नीम की फुनगी पर
बैठी चमकीली नीली चिड़िया
प्यार का अथाह समुद्र
लौटा लाती है मुझमें
और मैं
अपनी कुंवारी फुदकन में
तलाशती हूं
किसी साथ का किनारा
जैसे भूरी रेत पर
दबी हथेलियों में
खामोश नील पड़ जाए....!
या फिर मेरे उम्र की शाख
हरी-हरी पत्तियों से लद कर
हंसती हुई दोहरी हो जाए।
होता नहीं है ऐसा कुछ भी
सब कुछ वैसा ही है
जैसे प्यार के नाम पर
दे जाए कोई कच्ची कौड़ियां
और मन के एकाकी आंगन में
यादों के नाम पर
टपकने लगे कड़वी निंबौरियां... !