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कभी तो झरो शब्द-बूंद
कभी तो झरो मुझ पर एक ऐसी शब्द-बूंद कि मेरी मन-धरा पर प्रस्फुटित हो जाए शर्माया हुआ प्यार का कोमल अंकुरसिर्फ तुम्हारे लिए। कभी तो रचों मेरे इर्द गिर्द शब्द-फूलों का रंगीन समां कि मैं महकने लगूं और भर जाऊं खुशियों की गंध से सिर्फ तुम्हारे लिए। कभी तो आने दो मेरे कजरारे बालों तक नशीली शब्द-बयार का झोंका कि मेरे पोर-पोर में खिल उठें ताजातरीन कलियां सिर्फ तुम्हारे लिए। कभी तो पहनाओं अपनी भावनाओं को ऐसे शब्द-परिधान कि जिन्हें देखकर लहरा उठें मेरे भीतर का भीगा सावन सिर्फ तुम्हारे लिए। मत बरसाओं मुझ पर ऐसी शब्द-किरचें कि होकर लहूलुहान मैं, बस रिसते जख्म ही ला सकूं तुम्हारे लिए!