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कराह उठी मानवता

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गायत्री शर्मा

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कराह उठी मानवता
मौत के इन दंरिदों से
बू आती है दगाबाजी की
पड़ोसी के इन हथकंडों से।


हर बार बढ़ाया दोस्ती का हाथ
प्यार नहीं लाशें बनकर आई उपहार
बस अब खामोश बैठों देश के सत्ताधारों
अब वक्त है कर दो शासन जनता के हवाले।


जेहाद का घूँट जिसे पिलाया जाता
भाई को भाई का दुश्मन बताया जाता
वो क्या जाने प्यार की भाषा
प्यार निभाना जिसे न आता?


मेरा देश जहाँ है शांति और अमन
दुश्मन नहीं सबके दोस्त है हम
जरा आँखे खोलों ऐ दगाबाज नौजवानों
अपने भटके कदमों को जरा सम्हालों।


जानों तुम उन माँओं का दर्द
जिसने खोया है अपना लाल
सेज सजाए बैठी थी दुल्हन
पूछे अब पिया का हाल।


उन अनाथों के सपने खो गए
माँ-बाप जिनके इन धमाको में खो गए
ममता लुटाते सगे-संबंधी सारे
माँ-बाप की लाशों से लिपटकर रोते ये बेचारे।


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NDND
आतंक का तांडव मचाकर
क्यों माँगता है तू मौत की भीख?
ऐ दरिंदे जरा सोच उन लोगों के बारे में
जो हो गए अब लाशों में तब्दील।


कब्रगाह बने है आज वो स्थान
जहाँ बसते थे कभी इंसान
काँपती है रूहें अब वहाँ जाने से
आती है दुर्गंध अब पड़ोसियों के लिबासों से।

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