प्रिये बहुत दिनों बाद कल रात मुझे आई नींद और नींद में देखा सपना सपना भी अजीब था सपने में देखी नदी नदी पर देखा बाँध देखा बहते पानी को ठहरा नदी की प्रकृति के बिल्कुल विपरीत मैं तो डर गया था रुकी नदी को देख कर सपने में देखा कई लोग हंस-हंस कर लोट-पोट होते लोग रुकी हुई नदी के तट पर जश्न मानते लोग नदी को रुके देख खुश हो रहे थे लोग ठोंक रहे थे एक-दूसरे की पीठ जीत का जश्न मन रहे थे लोग प्रिये रुकी नदी पर हंसते भयावह लग रहे थे लोग
सपने में देखा सांप काला और मोटा सांप रुकी नदी के ताल में पलता यह सांप हंसते हुए लोगों ने पाल रखा है यह सांप मैं तो डर गया था मोटे और काले सांप को देख कर
प्रिये मैं तोड़ रहा था यह बांध खोल रहा था नदी का प्रवाह मारना चाहता था काले और मोटे सांप को ताकि नदी रुके नहीं नदी बहे, नदी हंसे नदी हंसे एक पूर्ण और उन्मुक्त हंसी और लहरा कर लिपट जाए मुझ से
प्रिये कल रात सपने में हंसी थी नदी मुझसे लिपट कर एक उन्मुक्त हंसी और नदी बोली कोई पूछे तो कहना रुकना नदी की प्रकृति नहीं।