FILE जला अस्थियां बारी-बारीचिटकाई जिनमें चिंगारी,जो चढ़ गए पुण्यवेदी परलिए बिना गर्दन का मोल।कलम, आज उनकी जय बोलजो अगणित लघु दीप हमारेतूफानों में एक किनारे,जल-जलाकर बुझ गए किसी दिनमांगा नहीं स्नेह मुंह खोल।कलम, आज उनकी जय बोलपीकर जिनकी लाल शिखाएंउगल रही सौ लपट दिशाएं,जिनके सिंहनाद से सहमीधरती रही अभी तक...