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कल्पवृक्ष

हेमंत गुप्ता 'पंकज'

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तुम
ND
तुम
भटक रहे हो
खाना-बदोश
नीले आकाश के तले
मैं तुम्हारे लिए
बनाऊँगा
एक सुरक्षित घर
स्थाई
तुम प्यासे हो
मैं तुम्हारी प्यास बुझाऊँगा
तुम भूखे हो
मैं तुम्हारी भूख मिटाऊँगा
तुम दहक रहे हो
दुनियावी दुखों में
मैं तुम्हें शीतलता दूँगा
अपने आँचल की
तुम ठिठुर रहे हो
मैं तुम्हें गरमाऊँगा
खुद खाक होकर भी
तुम्हें जिंदगी दूँगा
तुम्हारी हर इच्छा को
तृप्त करूँगा
तुम थके हुए हो
जीवन एक अवकाश-रहित क्षण
मैं तुम्हें
थपकियाँ दे-देकर सुलाऊँगा
लोरियाँ गा-गा कर सुनाऊँगा
दूँगा एक निश्चिंत नींद
भरपूर
जागरण
ताजगी भरा
तुम केवल इतना करो
मेरी परवरिश
सुनिश्चित कर दो
मेरा अस्तित्व
सुरक्षित कर दो
तुम
मानव हो
मैं
वृक्ष हूँ
तुम्हारा
कल्पवृक्ष।

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