आँखें आकाश टँगी ऐंठ गईं नदिया की देह गाँव जला धूप में मुँह फेरे बादल का नेह, पेड़ फरी चिंताएँ पेट में कटारी। बाबा का घर गया दिखी नहीं अम्मा की हंसुली भैया परदेश गए फीकी है भौजी की टिकुली, दुध-मुँहे उजालों के भाग लिखी अँधियारी। पंख-पंख झरता मन हाँफ गई उम्र की चिरइया धरती के होंठ फटे कुआँ-कुआँ झाँक रही गइया, हवा फिर महाजन-सी जिंदगी उधारी। काट रहे हम बारी-बारी।