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सहबा जाफरी
मुझको तेरा प्रेम, याद आया आज फिर
मेरा अश्रु टूटकर मुस्कुराया आज फिर
ठेस, यादें, सिसकियाँ,वफा, आँसू, हँसी
शब्द में शब्दों को गूँथ गीत गाया आज फिर
आत्मा के तीर से दर्द की इक झील देख
चंद्रमा मृदु स्मृति का मुस्कुराया आज फिर
शेर नग्मे, गीत, दोहे ओ' ग़ज़ल रुबाइयाँ
मुझमें छुपकर जाने कौन गुनगुनाया आज फिर
चाँदनी, जूही, चमेली, केतकी, कचनार फूल
इक बसंती शाम ने मुझको रुलाया आज फिर
तुझसे बिछुड़कर डूबती चाय के प्यालों में शाम
हमने ग़म को भुलाकर मुस्कुराया आज फिर।