साफ-सुथरा है बहुत,
सुसज्जित सामान।
आतंकित करता मुझे,
तेरा भव्य मकान॥
कपड़े बदले आपने,
बदले नहीं विचार।
खुली न मन की खिड़कियाँ,
खुले न मन के द्वार॥
हर डंडे को है यहाँ,
झंडे की दरकार।
बिन झंडे के आजकल,
डंडा है बेकार॥
घूम रही है शहर में,
एक पागल तलवार।
जो भी आता सामने,
होता वही शिकार॥
हर ताले की चाबियाँ,
रखता अपने पास।
इसलिए तो हो गया,
"चलता पुर्जा" खास॥
दीवारों में खिड़कियाँ,
लेकिन सब हैं बंद।
धूलभरी ये आँधियाँ,
घर को नहीं पसंद॥
धनपतियों की शान में, लिखे आपने लेख।लेकिन किसी गरीब का, नहीं किया उल्लेख॥दिशा नहीं रस्ता नहीं, मन है डाँवाडोल।पंछी यूँ ही डोल मत,अपने पर भी खोल॥खोलो मन की खिड़कियाँ, खोलो मन के द्वार।ढूँढ रही है आपको, शीतल मंद बयार॥चलता हूँ मैं धूप में, रख छाया की आसआगे कोई पेड़ है, होता है आभास॥