यहाँ नदी किनारेमेरा घर है।घर की परछाई बनती हैउस नदी में।रोज़ जाती हूँसुबह शाम नहाने गंगा में।गंगा से माँगती हूँ मनौतीएक बार देख पाऊँतुम्हें फिर।एक बार चूम पाऊँतुम्हारा माथा।एक बार पूछ पाऊँतुमसे।कि कभी मुझे याद करते हो।मेरी सुधि आती है।गंगा कब सुनेंगीमेरी बातें।कब पूरी होगीमेरी कामना। कभी होगा तुमसे सामना।ऎसी कुछ कठिन माँगतो नहीं है यह सब।
यदि कठिन है, तो माँगती हूँ
कुछ आसान।
किसी जनम हम-तुम
एक ही खेत में
दूब बन कर उगें।
तुम्हारी भी कोई इच्छा
हो अधूरी
तो मैं गंगा से माँग लूँ मनौती
गंगा मेरी सुनती है ।
साभार : वागर्थ