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गंगा से माँगती हूँ मनौती

आभा

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साहित्य
WDWD
यहाँ नदी किनारे

मेरा घर है।

घर की परछाई बनती है

उस नदी में।

रोज़ जाती हूँ

सुबह शाम नहाने गंगा में।

गंगा से माँगती हूँ मनौती

एक बार देख पाऊँ

तुम्हें फिर।

एक बार चूम पाऊँ

तुम्हारा माथा।

एक बार पूछ पाऊँ

तुमसे।

कि कभी मुझे याद करते हो।

मेरी सुधि आती है।

गंगा कब सुनेंगी

मेरी बातें।

कब पूरी होगी

मेरी कामना। कभी होगा तुमसे सामना।

ऎसी कुछ कठिन माँग

तो नहीं है यह सब।

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NDND
यदि कठिन है, तो माँगती हूँ

कुछ आसान।

किसी जनम हम-तुम

एक ही खेत में

दूब बन कर उगें।

तुम्हारी भी कोई इच्छा

हो अधूरी

तो मैं गंगा से माँग लूँ मनौती

गंगा मेरी सुनती है ।

साभार : वागर्थ

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