श्याम सखा 'श्याम'
जब भी मैं मुस्काने बैठा
ग़म आकर सिरहाने बैठा
याद सफ़र की सिर चढ़ बैठी
जब भी मैं सुस्ताने बैठा
और बढ़ी कुछ मेरी उलझन
जब भी मैं सुलझाने बैठा
फूलों की देकर कुरबानी
गुलशन को महकाने बैठा
बापू याद बहुत तुम आए
जब सुत को धमकाने बैठा
ठुकराया मंदिर-मस्जिद ने
तब वो जा मयख़ाने बैठा
खुद ही दुख में डूबा, वह तो
दुखड़ा किसे सुनाने बैठा
ज़ख्म पुराने उभरे अक्सर
जब भी दिल बहलाने बैठा
अपनी धुन का पक्का है वो
'श्याम' किसे समझाने बैठा ।
साभार : मसि-कागद