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चल घूमें और कहीं!

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कविता
-तारादत्त 'निर्विरोध'
NDND
अपने किसी अकेलेपन की
कोई जगह नहीं,
चल घूमें और कहीं।

कच्ची सड़कों पर चलने से
अच्छा उड़ते रहना,
जीवन का सीधा मतलब है
खुद से लड़ते रहना!
कटुताएँ मिल रही निरंतर
कोई वजह नहीं।

कुंठाओं की इस बस्ती में
सभी लोग चितकबरे,
आँखदार भी दृष्टिहीन हैं,
कानों वाले बहरे।

अँधी दौड़, पाँव के नीचे
कोई सतह नहीं।

काले चश्मों की दुनिया में
कौन किसे पहचाने?

वेतन एक निमिष का सुख है,
दुख अनाज के दाने।
चारों ओर धुँध के डेरे,
होती सुबह नहीं।
चल घूमें और कहीं।

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