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चाँद चला चुपचाप गगन में
प्रमिला मजेजी
चाँद चला चुपचाप गगन में छिपछिप तारे देख रहे हैं कहाँ चला है किधर मुड़ेगा पलक झपकते सोच रहे हैं। नीचे चाँद देखता चलता धरती ऊपर देख रही है नीचे जीवन, ऊपर जीवन खामोशी से सोच रही है। सारे जग को रोशन कर लो शायद चाँद कहा करता है हर सपने के बीच ह्रदय में गोरा चाँद चला करता है। चाँद नहीं धरती पर आता तारे भी आकाश शगुन है किंतु चाँदनी धरती पर है क्या विस्मय की बात नहीं है। अरमानों में बसी चाँदनी मैदानों में बिछी चाँदनी पत्ते-पत्ते सजी चाँदनी हर आँगन में खिली चाँदनी।
द्वार-द्वार पर खड़ी चाँदनी खिड़की-खिड़की झाँक गई है महल-दुमहलों की शोभा बन पत्थर पर चुपचाप चली है। कितनी कोमल स्वच्छ ह्रदय की मीनारों पर चढ़ी खड़ी है ताजमहल के ऊँचे गुंबद, खुद ही पार किया करती है। और चाँद की बात अलग है अमर उजाला लेकर चलता दिन-दिन घटकर, दिन-दिन बढ़कर दुनिया की रातों को रचता। उजली रातें, काली रातें बातों-बातों में आ जातींऔर चाँद की चार कल्पना कागज पर भी उतर न पातीं। बाट चाँदनी, बात चाँदनी राह जोहती पलक चाँदनी और अगर बादल छा जाएँ कहाँ चाँदनी, कौन चाँदनी। सौजन्य : शुभतारिका(अक्टूबर अंक)